Essay on Rajiv Gandhi in Hindi

राजीव गांधी पर निबंध| Essay on Rajiv Gandhi in Hindi

राजीव गांधी पर निबंध (Essay on Rajiv Gandhi in Hindi) – कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 और 12 के बच्चों और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए ( Rajiv Gandhi Essay in Hindi – राजीव गांधी पर निबंध) हिंदी में।

Essay on Rajiv Gandhi in Hindi

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राजीव गांधी पर निबंध / Essay on Rajiv Gandhi in Hindi

Essay on Rajiv Gandhi in Hindi 2000 Words

राजीव गांधी पर निबंध

भूमिका

विश्व रंगमंच पर मनुष्य नाटक के पात्रों के समान अपना-अपना अभिनय करते हैं। उसको अभिनय उसके व्यक्तित्व का परिचायक होता है। नाटक में नायक अपने उदात्तचरित्र और अभिनय के द्वारा ही अपना स्थान बनाता है। दर्शकों की श्रद्धा और सहानुभूति उसके कार्य के माध्यम से उसके प्रति भी जागृत होती है। भारतीय राजनीति के रंगमंच पर राजीव गांधी का उदय नाटक के नायक की भांति ही हुआ है। अल्पकाल में ही उन्होंने जो ख्याति अर्जित की है उसके मूल में उनके वंश और कुल का ही योगदान नहीं है अपितु अपनी सूझ-बूझ, चतुराई, साहस से वे विश्व-विख्यात हुए हैं। उनका आगमन भी उस दौर में हुआ है जब भारतीय राजनीति के आकाश में घने बादल छा गए थे तथा चारों ओर निपट अंधकार फैल गया था।

जीवन परिचय

श्री राजीव गांधी जी का जन्म 20 अगस्त 1944 ई. को बम्बई में हुआ था। उनकी माता विश्व विख्यात महिला इन्दिरा गांधी थी। पिता पारसी धर्म के श्री फिरोजशाह गांधी थे। जवाहर लाल नेहरू जैसे विश्व विख्यात और इतिहास पुरुष उनके नाना थे। उनके जन्म के समय पं. नेहरू अहमदनगर कारागार में थे। राजीव के जन्म के कुछ समय बाद इन्दिरा जी बम्बई से इलाहाबाद आ गई। जब जवाहर लाल नेहरू कारागार से रिहा हो गए तो इन्दिरा जी अपने पति और पुत्र के साथ आनन्द भवन में रहने लगीं। राजीव को बचपन में कभी लखनऊ और कभी दिल्ली तथा कभी साबरमति आश्रम में रहना पड़ता था, जहां गांधी जी उनके साथ बच्चों की तरह खेला करते थे।

कुछ बड़े होने पर राजीव को आरम्भिक शिक्षा के लिए शिव-निकेतन में भर्ती करा दिया गया जिसका संचालन मुख्याध्यापिका श्रीमति ऊषा भगत करती थी। कुछ समय के लिए राजीव को बोर्डिंग स्कूल में भी रहना पड़ा। सन् 1954 में उन्होंने देहरादून के प्रसिद्ध विद्यालय ‘दून’ स्कूल में प्रवेश लिया और सन् 1960 में वहां से सीनियर कैम्ब्रिज की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद वे लंदन के इम्पीरियल कॉलेज में चले गए और यहां एक वर्ष तक अध्ययन करते रहे। पुनः वे कैम्ब्रिज के ट्रिनीटी कॉलेज में दाखिल हो गए जहां उन्होंने मैकैनिकल इंजीनियर का कोर्स आरम्भ किया। इस काल में राजीव ने आइसक्रीम बेच कर, फैक्ट्री तथा बेकरी में काम कर अपने अध्ययन के लिए धन भी स्वयं अर्जित किया। अपनी भारतीय संस्कृति के प्रति लगाव होने के कारण वे कॉलेज की गोष्ठियों में अपने साथियों के साथ वाद-विवाद करते। मधुर-भाषी तथा शांत स्वभाव वाले होने के कारण वे अपने साथियों में प्रिय थे। इसी प्रकार की एक गोष्ठी में उनको परिचय इटेलियन युवती सोनिया से हुआ, जिससे वे कुछ समय पश्चात् विवाह सूत्र में बंध गए। लंदन से लौटने के बाद वे दिल्ली में फ्लाइंग क्लब के सदस्य बन गए और विमान संचालन का प्रशिक्षण प्राप्त करने लगे। प्रशिक्षण पूरा करने के पश्चात् सन् 1970 में वे एयर इण्डिया में विमान चालक बन गए।

राजनीति में आगमन

दुर्भाग्य वश 23 जून 1980 को राजीव गांधी के अनुज संजय गांधी की विमान-दुर्घटना में हृदय विदारक मौत हुई। युवा अवस्था में उनकी इस मौत से सारा देश स्तब्ध रह गया तथा इंदिरा गांधी जी के लिए उनकी मृत्यु विशेष कष्टदायी सिद्ध हुई। संजय गांधी, राजनीति में इन्दिरा गांधी जी का साथ देते थे। युवा-पुत्र की मृत्यु ने उन्हें अकेला कर दिया। राजीव इस समय यूरोप की यात्रा पर थे। भाई की मृत्यु के दु:खद समाचार से वे भी पीड़ित हुए और तुरन्त भारत लौट आए। दुर्भाग्य से उन्हें ही अनुज की चिता में अग्नि प्रज्ज्वलित करनी पड़ी। अब राजीव को राजनीति में प्रवेश करवाने के लिए कांग्रेस के अनेक सदस्य सक्रिय हो गए और वे राजीव तथा इन्दिरा को यही सलाह देते रहे। कांग्रेस के अनेक संसद सदस्यों ने एक हस्ताक्षर युक्त प्रस्ताव इन्दिरा जी के सम्मुख रखा परन्तु उन्होंने स्वयं इस पर कोई निर्णय नहीं लिया और राजीव को ही निर्णय लेने के लिए कहा। राजीव गांधी इस बात के लिए तत्पर न थे लेकिन अपनी मां की व्यस्तता देखकर और उनके कार्य की अधिकता तथा उत्तरदायित्व को समझकर उन्होंने इस ओर गम्भीरता से सोचना आरम्भ किया। अब वे राजनीतिक कार्यों में श्रीमती गांधी का हाथ बटाने लगे। राजनीति में उनकी संगठन-सामर्थ्य का प्रथम परिचय उस समय मिला जब 16 फरवरी 1981 को दिल्ली में किसान रैली का आयोजन किया गया। श्री गाँधी के कुशल संचालन तथा साहसिक नेतृत्व में कांग्रेस के 25 हजार कार्यकर्ता क्रियाशील रहे और इस रैली को विशेष रूप से सफल बनाने का प्रयास करते रहे। अन्ततः 11 मई 1981 को श्री बसन्त दादा पाटिल ने जो कांग्रेस कमेटी के तत्कालीन महासचिव थे राजीव गांधी के नाम को घोषणा एक पत्रकार सम्मेलन में की और श्री राजीव गांधी ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। अमेठी से उन्होंने अपना नामांकन पत्र संसद सदस्य के चुनाव के लिए भरा। इस क्षेत्र में चुनाव 9 जून 1981 को हुआ और 16 जून 1981 को उनके भारी बहुमत से विजयी होने की घोषणा की गई। 24 जून 1981 को उन्हें कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक में आमंत्रित किया गया। 17 अगस्त, 1981 को उन्होंने लोक सभा के सदस्य के रूप में शपथ ग्रहण की। 29 दिसम्बर को उन्हें युवा कांग्रेस के बंगलौर अधिवेशन में युवा कांग्रेस का नेता स्वीकार कर लिया गया। मई 1982 में हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, केरल तथा पश्चिम-बंगाल में विधान सभा के चुनाव में उन्होंने अनेक स्थानों पर जाकर चुनाव सभाओं को सम्बोधित किया तथा पूर्ण समर्पण के साथ अपनी पार्टी के लिए कार्य किया। नवम्बर 1983 में कलकत्ता में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में उन्हें भारतीय कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया गया।

प्रथानमंत्री के रूप में

31 अक्तूबर, 1984 को देश के इतिहास ने एक नया मोड़ लिया। यह दिन इतिहास में विश्वास की हत्या तथा धर्मान्धता और कुचक्रों के काले प्रतीक के रूप में याद रहेगा। इस दिन श्रीमती इन्दिरा गांधी के संरक्षकों ने उन्हें उनके निवास के बाहर गोलियों से छलनी कर दिया। देश की प्रिय नेता छिन जाने से तथा उन्हें सांप्रदायिकता की भेंट चढ़ाने से देश तथा विश्व को जन-जन स्तब्ध रह गया। संकट के इन क्षणों में ही 31 अक्तूबर को ही राजीव गांधी को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। जब दिल्ली आदि स्थानों में सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे और उनकी मां का शव लोगों के दर्शनार्थ रखा था तब भी वे स्थान-स्थान पर रात भर दंगा-पीड़ितों के बीच घूमते रहे तथा उन्हें हर संभव सहायता दिलवाने का प्रयास करते रहे। श्रीमती गांधी की मृत्यु के पश्चात् राष्ट्रीय शोक के 13 दिन पूरे होने के बाद सातवें आम चुनाव की घोषणा हुई। दिसम्बर 1984 में महाचुनाव हुए और इस चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को अभूतपूर्व विजय मिली। नव वर्ष 1985 के प्रथम दिन श्री राजीव गांधी निर्वाचित प्रधानमंत्री बने।

जहां तक प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी की उपलब्धियों का प्रश्न है उसे पक्षपात रहित होकर आंकने पर यही कहा जा सकता है कि जिस अल्प अवधि में श्री राजीव गांधी ने अनेक वर्षों से लटकती हुई पंजाब तथा असम की समस्याओं को सुलझाया है वह निश्चय ही उनकी बहुत बड़ी सफलता है। लगभग चार वर्षों से खड़ी और जटिल पंजाब समस्या जो समस्त भारत की अखण्डता के लिए खतरा उत्पन्न कर रही थी तथा जिसे उनकी स्वर्गीय मां सुलझा न पाई और जिसके कारण पंजाब का वातावरण असुखद हो गया था श्री गांधी ने उस का समाधान अत्यन्त चतुराई तथा सुखान्त रूप में किया। 24 जुलाई 1985 को अकाली दल के तत्कालीन अध्यक्ष सरदार हरचंद सिंह लौंगोवाल के साथ उन्होंने ऐतिहासिक पंजाब समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसी प्रकार पंजाब-समस्या से भी दीर्घकालीन समस्या असम-समस्या स्वतन्त्रता दिवस की प्रभात बेला में 15 अगस्त 1985 को समझौते के साथ समाप्त हुई। इसी दौर में लोकपाल बिल एवं दल-बदल रोकने के चिर-प्रतीक्षत कानून भी उनके कार्यकाल की अल्प अवधि में से संसद में पास हुए। देश द्रोह के कार्यों में संलग्न अनेक देशद्रोही गुप्तचरों का भण्डाफोड़ कर उन्होंने अनेक साहसी निर्णय लिए। पंजाब में हुए चुनाव में अब अकाली-दल को बहुमत प्राप्त हुआ और कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा तब भी उन्होंने अत्यन्त उदार होकर इसे अपनी पार्टी की हार न मानकर अपने देशवासियों की ही विजय बताया। इस अल्प अवधि में अर्थात् लगभग एक वर्ष से भी कम समय में उन्होंने दो बार विदेशों की सफल यात्राएं की तथा अमेरिका, रूस, पाकिस्तान, श्री लंका आदि देशों के राष्ट्रध्यक्षों से विश्व समस्या पर बातचीत की। वाशिंगटन तथा मास्कों में उनका अभूतपूर्व स्वागत हुआ। राष्ट्रपति रीगन ने उनकी प्रशंसा की।

एक सुनहरे सपने को दुःखद और त्रासद अन्त

21 मई 1991 को मद्रास से लगभग 50 कि. मी. दूर श्री पेरुंबुद्र में रात्रि के लगभग 10 बजकर 20 मिनट पर एक ‘मानव-बम’ द्वारा राजीव की भयावह, अत्यन्त दर्दनाक रूप से हत्या कर दी गई। उनका शरीर क्षत-विक्षत हे गया और अंग-प्रत्यंगों को पहचानना ही कठिन हो गया था। उनकी हत्या एल. टी. टी. ई. की घिनौनी साजिश का परिणाम थी। इस क्रूर हत्या से सारा विश्व स्तब्ध रह गया था। ‘धन’ नाम की एक क्रूर महिला ने अपने शरीर पर विस्फोटक बांध कर राजीव के चरण स्पर्श करने का अभिनय किया और भयानक विस्फोट के साथ राजीव का शरीर खण्डित हो गया। नारी का मधुर और करुणामय व्यक्तित्व कितना अमानवीय और राक्षसी हो सकता है। धनु का जीवन इसका प्रमाण है। सम्पूर्ण विश्व में इस हत्या-काण्ड की घोर निन्दा की गई। 24 मई 1991 को उनके पार्थिव शरीर को चन्दन की चिता पर शक्ति स्थल को समर्पित कर दिया गया। मां की मौन समाधि के पास ही उनकी समाधी भी मौन हो गई।

व्यक्तित्व

राजीव गांधी आकर्षक व्यक्तिव के धनी थे। सुन्दर गौरवर्ण धवल दन्त पंक्तियां, मधुर-मुस्कान और मितभाषी राजीव सबका मन सहज में ही मोह लेते थे। विश्व में सर्वाधिक कम आयु के प्रधानमन्त्री राजीव विरोधी दलों के प्रशंसा के पात्र भी रहे। स्वभाव से वे शान्त और सौम्य थे। नम्रता और उदारता उनकी विशेषताएं थी। उनका गंभीर व्यक्तित्व दूसरों को प्रभावित भी करता था तथा उनकी हास्य व्यंग्य से भरपूर प्रकृति सबको सहज भी कर देती थी।

अपने राजनीतिक जीवन के आरम्भिक जीवन में राजीव को विशेष सफलता मिली थी। पंजाब, मिजोरम और असम के हल के लिए जो समझौते हुए थे, वे सफल सिद्ध नहीं हो सके हैं। विदेशी मोर्चे पर जो सफलता मिली वह भी पानी के बुलबुलों जैसी सिद्ध हुई। मिखाइल गोर्बाचेव और रेगन के दिलों को जीत कर वे विश्व पर छा गए थे। धीरे-धीरे चापलूसों और मक्कारों ने राजीव को घेर लिया और उनकी कथनी और करनी में अन्तर बढ़ने लगा। शहबानो का मामला, पंजाब समझौते पर घपलेबाजी, बोफोर्स कांड ने उनकी छवि को धूमिल कर दिया। अपनी सरकार के जटिल संकटों को सुलझाने में वे नाकाम रहे। मि. ‘क्लीन’ के नाम से जाने जाने वाले राजीव जनादेश की उपेक्षा कर धीरे-धीरे स्वयं ही उपेक्षित हो गए। 1984 में जिन्हें ऐतिहासिक सफलता मिली थी, सन् 1989 में वे सफलता से बहुत दूर चले गए। अब वे विपक्ष के नेता के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने कहा था – हम पूरी विनम्रता के साथ लोगों के फैसले को स्वीकार करते हैं। हम नई सरकार को रचनात्मक सहयोग देने का वायदा करते हैं, इसके बाद राजीव के व्यक्तित्व में अनुभव जुड़ता गया। उन्हें एहसास हो गया कि उनसे भारी भूल हुई है। सत्ता से उनके हटने के 19 महीनों के बाद ही फिर चुनाव आ गए। अब वे जनता से सम्पर्क कायम करने के लिए भीड़ में घुलने मिलने के लिए अनथक प्रयास करने लगे। वे पूरे दम-खम से चुनाव प्रचार में जुट गए और इस दौरान वे दो घण्टे से भी अधिक सो नहीं पाते थे। शायद लोगों ने भी उनकी नाकामियों और असफलताओं भुला कर वी. पी. सिंह के आरक्षण कांड से त्रस्त होकर राजीव को पुनः अपना नायक बनाने का मन बना लिया था। लेकिन राजनीति में हुई हिंसा से वे निश्चय हीं चितित थे उन्होंने कहा था कि इस बार चुनाव में भारी हिंसा होगी और सत्य ही इस भारी हिंसा का बज्र उन पर ही टूट-पड़ा और इस प्रकार एक सुनहरे सपने का दुःखद तथा त्रासद अंत हो गया।

उपसंहार

राजीव गांधी को उनकी मृत्यु के बाद भारत-रतन की उपाधि दी गई जिसे राष्ट्रपति से उनकी पत्नी सोनिया गांधी ने एक सादे समारोह में प्राप्त किया। हत्याओं का यह खुला व्यापार सम्पूर्ण विश्व के लिए एक चुनौती है। आतंक और उग्रवाद को निश्चय ही समूल नष्ट करना होगा।

हम आशा करते हैं कि आप इस पत्र ( Essay on Rajiv Gandhi in Hindi – राजीव गांधी पर निबन्ध ) को पसंद करेंगे।

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