Essay On Charitra Bal In Hindi चरित्र बल पर निबंध

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hindiinhindi Essay On Charitra Bal In Hindi

Essay On Charitra Bal In Hindi 200 Words

विचार-बिंदु – • चरित्र एक महाशक्ति • चरित्र पर सर्वस्व अर्पण • चरित्र का विकास • चरित्र-बल के लाभ

‘चरित्र एक ऐसा हीरा है, जो हर किसी पत्थर को घिस सकता है।’ चरित्र केवल शक्ति ही नहीं, सब शक्तियों पर छा जाने वाली महाशक्ति है। जिसके पास चरित्र रूपी धन होता है, उसके सामने संसार भर की विभूतियाँ, संपत्तियाँ और सुख-सविधाएँ घुटने टेक देती हैं। सुभाष के चरित्र को देखकर असंख्य युवकों-युवतियों ने धन, संपत्ति, खून – यहाँ तक कि अपना पूरा जीवन होम कर दिया।

मुट्ठी भर हड्डियों वाले बापू पर विश्व की कौन-सी संपत्ति कुर्बान नहीं थी। चरित्र साधना है। इसे अपने ही प्रयास से पैदा किया जा सकता है। इसका तरीका भी बहुत सरल है – सद्गुणों पर चलना, अवगुणों से बचना। प्रेम, त्याग, करुणा, मानवता, अहिंसा को अपनाना तथा लोभ, मोह, निंदा, उग्रता, क्रोध, अहंकार को छोड़ना। चरित्रवान व्यक्ति स्वयं को धन्य अनुभव करता है। उसे अपना जीवन सफल प्रतीत होता है। संसार के कष्ट भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। उसके लिए काँटे भी फूल बन जाते हैं। अपमान भी सम्मान बन जाते है, जेल के सींखचे मंदिर बन जाते हैं, विष के प्याले अमृत बन जाते हैं। वह जब तक जीता है, संतुष्ट रहता है। उसे अपने किए पर पछतावा नहीं होता। वह छाती तानकर, नजरें उठाकर शान से जीता है।

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Essay On Charitra Bal In Hindi 700 Words

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक स्थान पर लिखा है: ‘चरित्र-बल हमारी प्रधान समस्या है। हमारे महान् नेता महात्मा गाँधी ने कूटनीति के चातुर्य को बड़ा नहीं समझा, बुद्धि के विकास को बड़ा नहीं माना, चरित्र बल को ही महत्व दिया है। आज हमें सबसे अधिक इसी बात को
सोचना है।”

सच्चरित्रता मनुष्य की एक ऐसी नैतिक-शक्ति है, जिससे वह संसार की किसी भी स्थितिपरिस्थिति का सामना कर सकता है, और जीवन की किसी भी ऊँचाई को प्राप्त कर सकता है। सच्चरित्रता को एक ऐसी महान सामाजिक विशेषता के रूप में समझा जा सकता है, जिससे सम्पूर्ण समाज स्वयं को सदैव गतिशील बनाए रखता है। सच्चरित्रता एक समाजिक मूल्य के साथ ही एक विशिष्ट मानव-मूल्य भी है। इस मूल्य का बीजारोपण विद्यार्थी जीवन से ही आरंभ हो जाता है। विद्यार्थियों द्वारा गाई जाने वाली यह वंदना इसका सहज उदाहरण कही जा सकती है।

“लीजिए हमको शरण में हम सदाचारी बनें।
ब्रह्मचारी, धर्म रक्षक, वीर व्रतधारी बनें।।”

समाज अपने प्रथम प्रयास से एक बालक-विद्यार्थी में सदाचार, ब्रह्मचर्य, धर्म रक्षा, और वीरता का व्रत धारण करने के गुण समाविष्ट करने का प्रयास करता है। ये गुण अपने सम्मिलित प्रयास में एक विद्यार्थी को सच्चरित्र विद्यार्थी ही बनाते हैं। वस्तुत: सच्चरित्रता ”गुणों का पुंज” है, जो समाज के प्रत्येक मनुष्य को सिर्फ उचित समाज-हित की दिशा में गतिशील ही नहीं करता, अपितु उस व्यक्ति को समाज के अन्य व्यक्तियों का अनुकरणीय भी बना देता है। एक सच्चरित्र मनुष्य अपने समाज का ‘आदर्श-रूप’ होता है। उसे उस समाज की वास्तविक आत्मा कहना चाहिए, क्योंकि एक सच्चरित्र मनुष्य ही भिन्न भिन्न प्रकार से अपने समाज का हित-साधन करता है। महान ऋषियों द्वारा रचित निम्नोक्त मंत्र भी हमें यही दर्शाता है कि सच्चरित्रता किस प्रकार मनुष्य को ज्योति-पुंज की ओर, प्रकाश की ओर ले जाती है। यथाः

“असतो मा सद्गमय,
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मा अमृतं गमय।”

अर्थात् ईश्वर से प्रार्थना करता हुआ एक सच्चरित्र ऋषि कहता है कि – हे ईश्वर, मुझे असत्य से सत्य की दिशा में ले चलो, अंधकार से प्रकाश की दिशा में ले चलो। सच्चरित्र मनुष्य सदैव स्वयं को और अपने समाज को असत्य और अंधकार की स्थिति से सत्य और प्रकाश की स्थिति की ओर ले जाने का प्रयास करता है। अपने साथ-साथ अपने देश और समाज को स्वस्थ, सुन्दर और मंगलमय की ओर ले जाने का प्रयास करता है। इस प्रकार हमें यह सहज ही अनुभव होता है कि सच्चरित्रता एक व्यष्टि मूल्य होने के साथ ही एक समष्टि मूल्य भी है जो हमारे भीतर वीरता, करुणा, प्रेम, सद्व्यवहार, सदाचार और नैतिकता आदि मानवीय मूल्यों का प्रेषण करती है। सच्चरित्रता का मूल्य हमें दुश्चरित्रता के समक्ष समझ में आती है। दुश्चरित्र मनुष्य अपने कुसंस्कारों और नीच कर्मों से न केवल अपना जीवन दूषित करता है बल्कि अपने कुप्रभाव से वह सम्पूर्ण सामाजिक जीवन को भी दूषित और कलुषित करता है और इस प्रकार सामाजिक जीवन का ह्रास का शिकार होना आरंभ हो जाता है, उस स्थिति में, सामाजिक मानवीय जीवन के रक्षार्थ जिस एकमात्र वस्तु की आवश्यकता सम्पूर्ण मानव समाज महसूस करता है, वह वस्तु होती है-‘सच्चरित्रता’। सच्चरित्रता सामाजिक विशृंखलता को अवरोधित कर उसे पुन: व्यवस्थित करके मानवीय चेतना की ओर अग्रसर करती है। यह उदाहरण सच्चरित्रता के सामाजिक मूल्य को हमारे समक्ष उदघाटित करता है।

भारत की संस्कृति और सभ्यता प्रारम्भ से ही चरित्र के नैतिक-स्वरुप पर बल देने वाली सभ्यता रही है। आदि-काव्य ‘रामायण’ इस बात का सबल उदाहरण प्रस्तुत करता है। परवर्ती काल में तुलसीदास जी ने जिस महान ग्रंथ, ‘रामचरित मानस’ की रचना की, वह वस्तुत: राम के सच्चरित्र व्यक्तित्व का महिमा गान करने वाला ग्रंथ ही है। तुलसीदास जी ने एक स्थान पर लिखा है।

“सठ सुधरहिं सत्संगति पाई। पारस परस कुधातु सुहाई।”

अर्थात् दुष्ट और नीच मनुष्य भी सत्संगति के प्रभाव से सुधर जाता है। ठीक उसी तरह, जैसे लोहा पारस का स्पर्श पाकर सोने का रूप ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार गोस्वामी जी ने सच्चरित्रता पर बल देते हुए उसके निर्माण में ‘सत्संगति’ के महत्व को रेखांकित किया। है। कबीरदास जी ने भी सत्संग की महिमा का गान खूब किया है।

वैसे देखा जाए तो सच्चरित्रता ही मनुष्य का विराट नैतिक बल होती है जो उसे सम्पूर्ण समाज का अनुकरणीय और पूज्य बना देती है। साथ-ही-साथ वह उस व्यक्ति को भी नाना गुणों और विशेषताओं से भर देती है। मनुष्य इस सच्चरित्रता का निर्माण, सद्-पुरुषों की संगति और मूल्योंन्मुख शिक्षण संस्थाओं के सहचर्य में करता है, और अन्त में इस नैतिक चरित्र बल के कारण वह अपने जीवन को आदर्श स्थिति में पहुँचाने में सफल होता है।

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