Essay on Nuclear Power in Hindi परमाणु शक्ति पर निबंध

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Essay on Nuclear Power in Hindi

परमाणु शक्ति और विश्वशान्ति

रुदरफोर्ड तथा अन्य वैज्ञानिकों ने परमाणु के केन्द्र तथा उसके बाहर उपस्थित कणों की खोज की थी। परमाणु के नाभिक में न्यूट्रॉन तथा प्रोट्रॉन होते हैं और बाहर के कक्ष में इलेक्ट्रॉन होते हैं। ये इलेक्ट्रॉन जो बाहरी कक्ष की ओर होते हैं रासायनिक क्रियाओं के दौरान महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। आईन्स्टीन द्वारा परमाणु के अवयवों में विघटन के बाद जर्मन वैज्ञानिकों ने परमाणु बम बनाने के प्रयास किए। 1939 में विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. ओपेन हाइमर ने परमाणु बनाने के सम्बन्ध में अमेरिका के राष्ट्रपति रूजवेल्ट को जानकारी दी थी। विश्व में सर्वप्रथम अणु विस्फोट 13 जुलाई, 1944 में अमेरिका द्वारा किया गया था। इसके पश्चात् ही रूस, फ्रांस जैसे देशों ने अनुशक्ति प्राप्त की। भारत ने राजस्थान के पोखरण नामक स्थान में सन् 1974 को पहला परमाणु विस्फोट किया था।

यह कितनी विचित्र बात है कि परमाणु बम के साथ जब हम शान्ति का नाम लेते हैं तो विरोधाभास प्रतीत होता है। परमाणु के नाम से ही प्रतीत होता है कि वह विनाश का ही कारण है। हम कहते हैं कि परमाणु शक्ति और विश्वशान्ति, परन्तु यह भी स्पष्ट है कि यदि मनुष्य इसका दुरुपयोग करने लगे तो यह शक्ति अशान्ति और आतंक का भी कारण है। वस्तुतः सृष्टि का हर पदार्थ ही शुभत्व और अशुभत्व का कारण है। जहां विष मृत्यु का कारण है, वहां उसका ठीक किया हुआ प्रयोग जीवन शक्ति भी प्रदान करता है। घी एक पौष्टिक पदार्थ है, पर उसका दुरुपयोग मानव शरीर में रोग भी पैदा कर देता है। यदि परमाणु शक्ति का सदुपयोग किया जाए तो विश्व में कोई देश निर्धन नहीं रह सकता। बंजर भूमि हरियाली में बदली जा सकती है। बसुन्धरा शस्य श्यामला बन सकती है। यदि इसका दुरुपयोग किया जाए तो शायद विश्व का कोई भी प्राणी नहीं बच सकता।

आज विश्व की मानवता त्रस्त हो गई है। विश्वव्यापी दो महायुद्धों से मानवता इतनी भयभीत नहीं थी, इतनी आतंकित और त्रस्त नहीं हुई थी जितनी आज आंतकित है। तृतीय महायुद्ध का नाम लेते ही विश्व भर की मानव जाति भयभीत हो उठती है युद्ध रोकने का उपाय करने लगती है। यह सब इसलिए कि परमाणु शक्ति तलवार मानव जाति के सिर पर लटक रही है। आज के विज्ञान का सफल प्रयोग परमाणु शक्ति है।

सब से पहले 1945 में अमेरिका ने जापान पर दो परमाणु बम गिराए थे जो आज के परमाणु बमों के सामने एक खिलौना थे। उन दो बमों से जापान के दो नगर हीरोशिमा और नागासाकी क्षण भर में पूर्णतयः समाप्त हो गए थे। डेढ़ लाख के लगभग जनसंख्या अकाल के गाल में चली गई थी। दोनों नगरों में बड़े-बड़े गड्डे पड़ गए थे। 200 मील तक के क्षेत्र में इमारतें खिड़कियां झनझना उठी थीं। कितने ही लोग अपंग हो गए थे। मानवता ने ऐसा विनाशकारी रूप विश्व के इतिहास में शायद पहले कभी नहीं देखा था।

युद्ध समाप्त हो गया परन्तु मानव की दानवता समाप्त न हो पाई। बड़े-बड़े राष्ट्र इस परमाणु शक्ति की खोज में जुट गए। धीरे-धीरे अनेक राष्ट्रों ने अणु बम बनाने में सफलता भी प्राप्त की। इन देशों में इंग्लैंड, अमेरिका, फ्रांस, रूस और चीन के नाम उल्लेखनीय हैं। इन पांच राष्ट्रों-अमरीका, इंग्लैंड, फ्रांस, चीन और रूस ने परस्पर होड़ करते हुए परमाणु शक्ति में बहुत तरक्की कर ली है।

इस शक्ति के घातक प्रयोग का निषेध होना चाहिए। इस सम्बन्ध में सभी राष्ट्रों में परस्पर विचार चलता रहता है क्योंकि सभी राष्ट्र इस शक्ति से भयभीत हैं।

कोई भी राष्ट्र चाहे कितना भी शक्ति सम्पन्न क्यों न हो, अपने राष्ट्र का भय तो उसे भी है। इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ में बहुत बार यह प्रशन उठा कि परमाणु शक्ति का निषेध होना चाहिए। जब भी बड़े-बड़े राष्ट्रों में निरस्त्रीकरण की वार्ता चली, सबसे पहले परमाणु शक्ति के निषेध का प्रशन उठा। सभी राष्ट्रों ने एक स्वर से इसका विरोध किया, उन राष्ट्रों ने भी जो परमाणु शक्ति की होड़ में लगे हुए हैं।

सन् 1955 में जेनेवा में पहला सम्मेलन हुआ और यह सम्मेलन बहुत सफल रहा। इसमें सभी ने कहा कि परमाणु शक्ति पर रोक लगानी चाहिए। उसके बाद 21 अक्तूबर, 1957 को फिर इसी समस्या पर विचार किया गया। इंग्लैंड, अमरीका और रूस इस बात के लिए मान गए कि परमाणु अस्त्रों को कम करना चाहिए। मानव जाति प्रसन्न हो उठी, लोग आशान्वित हो उठे, परन्तु मार्च, 1961 में जब पुनः सम्मेलन हुआ तो इंग्लैंड और अमरीका ने कुछ ऐसी शर्ते रखीं जिन्हें रूस ने नहीं माना। आशा धूमिल हो गई लेकिन उसके बाद इंग्लैंड, रूस और अमरीका ने वायुमण्डल परीक्षण न करना मान लिया। फ्रांस ने भी इसे मंजूर न किया।

18 मई, 1974 को प्रात: 8 बजे राजस्थान के पोखरण नामक स्थान में भारत ने सफल भूमिगत परमाणु शक्ति विस्फोट किया। इस तरह अब परमाणु शक्ति का प्रयोग करने वाले – अमरीका, इंग्लैंड, फ्रांस, रूस, चीन, भारत तथा पाकिस्तान हैं। बाकी बहुत से देश भी जैसे संयुक्त अरब गणराज्य, आस्ट्रिया आदि इस ओर प्रयत्नशील हैं। ऐसा लगता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में जाकर निरस्त्रीकरण और परमाणु शक्ति के निषेध पर लम्बे-लम्बे भाषण तो सभी देते हैं और बहुत बार इस तरह की सन्धियां भी करते हैं परन्तु भीतर ही भीतर परमाणु शक्ति की तैयारी में सभी लगे हुए हैं। परन्तु एक दिन ऐसा अवश्य आएगा जब परमाणु शक्ति विश्व में शक्ति, समृद्धि और कल्याण का साधन बनेगी।

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