Essay on Politics in Hindi राजनीति पर निबंध

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Essay on Politics in Hindi

भ्रष्ट राजनीति पर निबंध

एक समय था, जब किसी देश अथवा क्षेत्र विशेष का शासन वहां के निवासियों के द्वारा चुनी हुई सरकार न करके कोई वंश परम्परागत रूप से किया जाता था। शासक राजा कहलाया जाता था और इस प्रकार के शासन को ‘राजतंत्र’ कहकर संबोधित किया जाना था। धीरे-धीरे समय बदला और उसके साथ-साथ शासन की पद्धति भी बदली। लोग देश-सेवा, समाजसुधार आदि की पवित्र भावना से आलोकित होकर, समाज रूपी कार्य-क्षेत्र में कूद पड़ते थे और आजीवन बिना किसी स्वार्थ अथवा तुच्छ हित साधन की चेष्टा से, समस्त-मानव जाति के सुख, आनन्द और उसके व्यापक हित के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया करते थे। राजा राममोहन राय, विवेकानन्द, रामानन्द, बालकृष्ण भट्ट, बालगंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल, महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, भीमराव अम्बेडकर, सरदार भगत सिंह, उधम सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, राममनोहर लोहिया, राजेन्द्र प्रसाद आदि सैंकड़ों नाम ऐसी ही महान विभूतियों के हैं, जिन्होंने अपने जीवन को परहित में न्यौछावर कर दिया। इन लोगों ने अपनी भारत-भूमि को अंग्रेज़ी शासन की पराधीनता से मुक्ति दिलाना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। कहने की आवश्यकता नहीं कि भारतीय राजनीति का स्वच्छ, पावन और कर्म प्रधान रूप-स्वरूप वस्तुतः इन्हीं कर्मयोगी नेताओं की देन था। इन्होंने समाज के हित में ही उसके विकास की दिशा में राजनीति को उल्लेखनीय रूप से रेखांकित किया। राजनीति इनके लिए एक समाज-सेवा और उत्तरदायित्व ही थी। उसके माध्यम से अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति इन लोगों की कल्पना से भी परे था।

जैसे ही भारत को आज़ादी प्राप्त हुई, राजनीति का स्वरूप भी बदलने लगा। राजनीति में समाज के शोषक लोग जमींदार, महाजन, पूंजीपति और लोभी लोग भी शामिल होने लगे। समाज सेवा और पवित्रता का चोला ये धनलोलुप लोग अन्दर से धन-स्वार्थी हुआ करते हैं। भ्रष्टाचार को, इन्हीं नेताओं की देन मानना चाहिए। जो कार्य पहले व्यापक सामाजिक-सुधार और देश-भक्ति की भावना से ओत-प्रोत होकर किए जाते थे, वही काम इन नेताओं के लिए पैसा बनाने के साधन बन गए। धन-बल के साथ ही राजनीति में ‘गन-बल’ का भी समावेश होने लगा। यह राजनीति का विकृत होता हुआ रूप, सन् 1950-60 के हिन्दी कवियों की कविताओं में विस्तार और अत्यधिक गंभीरता के साथ चित्रित हुआ है। नयी कविता के कवि मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा आदि ने अपनी कविताओं में राजनीति के भ्रष्ट होते रूप को मार्मिक और ठोस अभिव्यक्ति प्रदान की है। प्रगतिवादी कवि नागार्जुन ने लिखा:

‘सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ-जहाँ ठगने लगी शासन की बंदूक।
जल ठूठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक॥”

शासन और राजनीति का अर्थ ही बदल गया। वह इतनी भ्रष्ट और तानाशाही हो गयी कि अहिंसा और सत्य आदि के मूल्य स्खलित हो गए। आम जनता जब भी शोषक और तानाशाही शासन के विरूद्ध खड़ी होने का प्रयास करती, तब शासन एक बंदूक का रूप ले लेता। हज़ारों मासूम और निर्दोष लोग मौत के घाट उतार दिये जाते। भ्रष्ट राजनीति के प्रमुखतः तीन लक्षण होते हैं:धन का लोभ, बल का प्रयोग और भय का व्यापार। भ्रष्ट राजनीति अपने को बनाए रखने के लिए सदैव इन्हीं तीन तत्वों का अवलम्बन ग्रहण करती है।

भ्रष्ट राजनीति, जाति, धर्म अथवा नस्ल आदि की संकीर्णताओं को जनता में प्रचारित कर उन्हें विभाजित करने का कार्य करती है। अत: राजनीति, जिसे सामाजिक उन्नयन का माध्यम माना जाता था, समाज का अवमूल्यन करती है।

आज भारतीय राजनीति भ्रष्ट होती जा रही है। जनता को पूरे आत्मविश्वास के साथ इस प्रकार की राजनीति का विरोध कर स्वच्छ और पावन राजनीति को स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए।

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति और भारत

एक समय था, जब देश परस्पर मित्र अथवा शत्रु घोषित रूप से होते थे। किन्तु आज न केवल अर्थ-क्षेत्र में वैश्विक स्थितियां और परिस्थितियां परिवर्तित हुई हैं अपितु राजनीति के क्षेत्र में भी स्थितियों और परिस्थितियों में परिवर्तन देखने में आ रहा है। जहाँ प्रत्यक्ष और प्रकट रूप से एक देश अन्य देशों का शोषण करने का प्रयत्न करता था वहीं आज ऐसी बात नहीं रह गयी है।

‘चाणक्य’ पत्रिका ने वैश्विक राजनीति के बदलते परिदृश्य को कुछ इस प्रकार चित्रित किया है। ‘सन् 1991 के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के परिदृश्य में बदलाव आया हैं। ‘संघर्ष’ के स्थान पर ‘सहयोग’ ने अपना स्थान बनाया है। राष्ट्रीय हितों के निमित्त ही प्रत्येक राष्ट्र आपसी संबंध स्थापित करता है। पामस्टर्न ने ठीक ही कहा है कि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में न कोई किसी का स्थायी शत्रु होता है और न कोई स्थायी मित्र। अगर कोई चीज स्थायी है तो वह है राष्ट्रीय हित।

वस्तुत: आज विश्व की प्राथमिकता आर्थिक क्षेत्र का व्यापक विकास करना है। विश्व का प्रत्येक देश आज इसी प्रवृत्ति से परिचालित दिखाई पड़ रहा है। इस प्रवृत्ति ने प्रत्येक देश को प्रचलित राजनीतिक सोच और तरीके को छोड़कर नये समय के अनुसार ढलने को बाध्य कर दिया है।

अगर हम बीते वर्षों पर निगाह डालें तो हमें कतिपय ऐसे संकेत और सूत्र प्राप्त होंगे, जिनके अध्ययन से हम इस परिवर्तन के मूलभूत कारणों को समझ सकेंगे। आज विश्व को एक सांचे में तथा पूरे विश्व में एकरूपता स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। इस संदर्भ में व्यापक कार्य संभवतः हो भी चुका है।

नयी आर्थिक नीतियां और सूचना एवं संचार-क्रांति, इन दोनों को हम इन कारणों में प्रधान मान सकते हैं।

सन् 1990 के बाद भारत ने नयी आर्थिक नीतियां स्वीकार की और आज इस दिशा में अत्यंत तीव्र गति से बढ़ता चला जा रहा है। इन नयी आर्थिक नीतियों के कारण विश्व एक सूत्र में बंध सा गया है। हमारे आर्थिक एवं संसाधनगत हित एवं स्वार्थ परस्पर एक दूसरे से बंध गए हैं। विगत वर्षों में विश्व के देशों ने भारत के साथ नये संबंध बनाने की चेष्टा की है।

चाहे वह अमेरिका हो, इंग्लैंड हो, रूस अथवा विश्व का कोई अन्य देश, आज भारत सभी को किसी न किसी प्रकार से फायदा दे सकने वाला क्षेत्र दिखाई पड़ रहा है। इसका कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपरिमित विकास और उन्नति की अवस्था प्राप्त की है। फलतः आज भारतीय अर्थव्यवस्था का एक वैश्विक महत्व बन गया है।

उदारवादी नीतियों ने प्रत्येक देश की अर्थव्यवस्था को एक वैश्विक-अर्थव्यवस्था के रूप में बदल दिया है। इससे विश्व का कोई भी अन्य देश अपने आर्थिक लाभ और हानि को देखते हए, उस अर्थव्यवस्था में आ जा सकता है।

इसी ‘वैश्विकता’ के कारण आज समस्त विश्व को एक ग्राम कहकर भी संबोधित किया गया है। वस्तुतः यही समसामयिक राजनीति का बदलता रूप-स्वरूप है जो किसी भी प्रकार की हिंसा के स्थान पर सहयोग को महत्व देती हैं।

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