Essay on Mere Jeevan ka Lakshya in Hindi

Essay on Mere Jeevan ka Lakshya in Hindi for all students of class 1, 2, 3, 4, 5, 7, 8, 9, 10, 11 and 12. Most students find difficulty in writing essay on new topics but you don’t need to worry now. Read and write this essay in your own words. Mere Jeevan ka Lakshya paragraph in Hindi. मेरे जीवन का लक्ष्य पर निबंध।

hindiinhindi Mere Jeevan ka Lakshya in Hindi

Mere Jeevan ka Lakshya in Hindi 200 Words

विचार – बिंदु-• लक्ष्य का लाभ • मेरा लक्ष्य • लक्ष्य-पूर्ति का प्रयास।

लक्ष्यपूर्वक जीने से जीवन का रस बढ़ जाता है। तब हमारे जीवन की गति को एक निश्चित दिशा मिल जाती है। मैंने निश्चय किया है कि मैं इंजीनियर बनकर इस संसार को नए-नए साधनों से संपन्न करूंगा। देश में जल-बिजली, सड़क या संचार – जिस भी साधन की आवश्यकता होगी, उसे पूरा करने में अपना जीवन लगा दूंगा। मैं बड़ा होकर भवन-निर्माण की ऐसी सस्ती, सुलभ योजनाओं में रुचि लूंगा। जिससे मकानहीनों को मकान मिल सकें।

मैंने सुना है कि कई इंजीनियर पैसे के लालच में सरकारी भवनों, सड़कों, बाँधों में घटिया सामग्री लगा देते हैं। यह सुनकर मेरा हृदय रो पड़ता है। अतः मैं कदापि यह पाप-कर्म नहीं करूंगा, न अपने होते यह काम किसी को करने दूंगा। मैंने अपने लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में प्रयास करने आरंभ कर दिए हैं। गणित और विज्ञान में गहरा अध्ययन कर रहा हूँ। मैं तब तक आराम नहीं करूंगा, जब तक कि लक्ष्य को पा न लूँ।

Mere Jeevan ka Lakshya in Hindi 1000 Words

“माँ, माँ, मैं ट्रैफिक पुलिसमैन बनूंगा।” मैं घर में घुसते ही चिल्लाया। माँ के साथ माँ की सखियाँ बैठी थीं। यह सुनते ही सभी हँस पड़ीं। माँ ने मुझे गोद में बैठाया और पूछा-‘‘ट्रैफ़िक पुलिसमैन ही क्यों ?” मैं तब चार वर्ष का था। पिता जी के साथ बाजार गया तो चौराहे पर ट्रैफिक पुलिसमैन को देखा। उसकी वर्दी और आगे-पीछे हुई गाड़ियों ने मुझे प्रभावित कर दिया और तभी शायद मन में ट्रैफिक पुलिसमैन बनने की इच्छा ने अँगड़ाई ली।

कुछ और बड़ा हुआ तो अभिलाषा उत्पन्न हुई अभियंता बनने की, क्योंकि पिता जी अभियंता थे। घर में कोई चीज खराब हो, झट पिता जी के सामने हाजिर। पिता जी भी उसे शीघ्र ठीक कर देते। तो क्यों न जगती ऐसी अभिलाषा। ट्रैफ़िक पुलिसमैन बनने की कामना तो न जाने कब से गायब हो चुकी थी। समय पंच लगाकर उडता रहा और उसी के साथ न जाने कितनी कामनाओं ने करवटें बदलीं। फिर एक समय ऐसा आया कि जाने-अनजाने ही मैंने अपना जीवन लक्ष्य निर्धारित कर लिया। दादी माँ को रोज़ रामचरितमानस का पाठ करते देखा, उसे पढ़ने की उत्सुकता हुई और आद्यंत पढ़ डाला। लगा कि यह एक कथा का ताना-बाना ही नहीं, इसमें तो जैसे सारा संसार समा गया है। सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियाँ, मानव-मूल्य, मानवीय संबंधों की गरिमा, प्रेम, दया, ईर्ष्या, द्वेष सभी तरह की भावनाएँ, कहीं कुछ भी तो अछूता नहीं रहा। इस एक ही रचना ने साहित्य पढ़ने की ललक उत्पन्न कर दी। पढ़ते-पढ़ते न जाने कब स्वयं आशु कवि बन बैठा और साहित्यकार बनना ही मेरा जीवन लक्ष्य बन गया।

मैं अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सतत प्रयत्नशील हूँ। जब लक्ष्य सामने हो, आंखों में सपने हों, व्यक्ति में रुचि और प्रतिभा हो, परिस्थितियों से लड़ने का सामर्थ्य हो, तो लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग सहज हो उठता है। इस मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा मुझे दी मेरे हिंदी अध्यापक ने। उन्होंने सदा मेरा मार्ग दर्शन किया और जब भी मैं मार्ग से भटकने लगता वे कवि दिनकर की पंक्ति दोहरा देते –

“थककर बैठ गए क्या भाई ! मंज़िल दूर नहीं है।”

इन पंक्तियों को सुनकर मेरे मन में उत्साह की एक नई लहर दौड़ जाती। मेरे अध्यापक मुझे निरंतर पढ़ने की प्रेरणा देते, हर प्रकार का साहित्य मुझे लाकर देते और फिर उन पुस्तकों पर चर्चा करते। साहित्य पढ़कर ही मैंने सीखा कि किस प्रकार समाज की बनती-बिगड़ती स्थितियाँ साहित्यकार को निरंतर प्रभावित करती हैं। वह अपने आसपास की स्थितियों, समाज के गुण-दोषों, संस्कृति, मानव-मूल्यों और संवेदनाओं को अपने साहित्य का विषय बनाता है और अपनी लेखनी से यथार्थ का चित्र ही नहीं उकेरता अपितु आदर्श भी सामने रखता है। समाज को उचित दिशा भी देने का प्रयास करता है और ऐसा ही साहित्यकार युगातीत बनता है। कबीर, तुलसी दास, प्रेमचंद जैसे साहित्यकार ऐसे ही हैं जिनकी रचनाएँ सदा ही पाठकवर्ग को प्रभावित करती रहेंगी।

इन महान साहित्यकारों का साहित्य मुझे सदैव ही श्रेष्ठ साहित्य रचना करने की प्रेरणा देता है। मैं भी ऐसे साहित्य का सजन करना चाहता हूँ जो ‘सत्यं शिव सुंदरम्’ को स्वयं में समाए हो, जो जन-जन की भावनाओं को वाणी दे सके और सुखी-स्वस्थ समाज के निर्माण में अहम भूमका निभा सके। मेरे साहित्य में तुलसी, प्रेमचंद-सी युगचेतना हो; सूर, प्रसाद जैसी कोमल मृदु भावनाएँ हों, निराला का निरालापन हो, महादेवी की संवेदना हो, दिनकर का ओज हो, पंत का प्रकृति प्रेम हो और साथ ही हो कबीर-सी सरल सहज नीति।

मैं अपनी लेखनी से जन-मन में नव-चेतना का संचार कर सकूँ। मैं शोषण के विरुद्ध आवाज बुलंद कर सकूँ और सामाजिक कुरीतियों का मूलोच्छेदन कर सकूँ, मैं भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर सकूँ। कार्लाइल कहते हैं, “अपने जीवन का एक लक्ष्य बनाओ और उसके बाद सारा शारीरिक और मानसिक बल, जो ईश्वर ने तुम्हें दिया है, उसमें लगा दो।” मैं उनके इस उपदेश पर अमल करते हुए अपने लक्ष्य प्राप्ति के पथ पर अग्रसर हूँ और उसके लिए प्रयत्नशील हूँ। मैं भले ही अभी एक विद्यार्थी हूँ, परन्तु जिस प्रकार एक अच्छा अध्यापक जीवन भर एक विद्यार्थी बना रहता है, उसी प्रकार मैं भी जीवन भर एक विद्यार्थी बना रहना चाहता हूँ। मैं सदा सीखता रहूँ और यही सीख साहित्यकार के रूप में अपनी रचनाओं द्वारा दूसरों को देता रहूँ। यही कामना है और यही है मेरे जीवन का लक्ष्य।

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