Suryakant Tripathi Nirala in Hindi Biography सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जीवन परिचय

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hindiinhindi Suryakant Tripathi Nirala

Suryakant Tripathi Nirala in Hindi 500 Words

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का जन्म सन् 1896 में वसंत पंचमी के दिन हुआ था। निराला छायावाद के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। निराला की कविताओं का अध्ययन-अध्यापन उन्हें एक तरफ पिछली पीढ़ी की खड़ी-बोली कविता की परम्परा से जोड़ता है, तो दूसरी तरफ उनकी आगामी पीढी के संदर्भ में उनके होने की अनिवार्यता को भी महसूस कराता है।’अनामिका’ से लेकर ‘सांध्य काकली’ तक की उनकी काव्य-यात्रा तथा उनका समृद्ध गद्य उन्हें हिन्दी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान दिलाने के लिए पर्याप्त हैं। निराला छायावाद के एक मात्र ऐसे कवि और रचनाकार हैं जिन्होंने न केवल अपने युग-सत्य का सूक्ष्म अंकन किया अपितु परिवर्तित होते युग-सत्य को भी उतनी ही सहृदयता से अपने काव्य में स्थान प्रदान किया। इतनी गहरी सूक्ष्म-दष्टि प्रायः बिरले रचनाकारों में ही पाई जाती है। निराला इस मायने में एक बिलक्षण कवि थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में गढ़ाकोल नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता एक कर्मठ और अनुशासन-पसंद कान्यकुब्ज ब्राम्हण थे। उनका नाम था पंडित रामसहाय त्रिपाठी।

निराला का काव्य विविध भाव-भूमि और दार्शनिक तथा वैचारिक रुझानों से भरा हुआ काव्य है। उसमें जितनी विविधता हमें सहज ही दिखलायी पड़ती है उतनी विविधता समग्र रूप से भी अन्य काव्य-साहित्य में नहीं होती। प्रकृति, विद्रोह, समाजिक-चेतना, राष्ट्र-भावना, जाति और वर्ण का विरोध, ऊँच-नीच का विरोध, श्रृंगार और प्रेम आदि गतिशील काव्यप्रवृत्तियां उनके काव्य में रहीं हैं। वस्तुतः निराला का व्यक्तिगत जीवन ही इतना विश्रृंखल और बिखरा हुआ रहा है कि उसकी छवियों को हम उनके साहित्य में स्वत: ही देख सकते हैं। रामविलास शर्मा लिखते है: “तीन चरणों में कविताएँ विभाजित करने से आप देख सकेगें। कि निराला की कला में विकास होता है, या सस या वह ज्यों की त्यों बनी रहती है। एक ही विषय पर विभिन्न चरणों में लिखी हुई कविताएँ पढ़कर आप तुलनात्मक अध्ययन से यह परख सकते हैं कि उस विषय के प्रति निराला की दृष्टि कितनी और कैसी परिवर्तित हुई है। विशेष रूप से आप देखेंगे कि सन् 1947 के बाद छायावादी कवियों की स्थिति जैसी रही है, उससे निराला जी कितने भिन्न हैं। इस संग्रह से यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि अपने अंतिम चरण में निराला नये मनोबल से कविताएँ रच रहे थे और इनमें हिन्दी संसार को वह ऐसा कुछ दे रहे थे, जैसा कुछ उन्होंने पहले न दिया था।”

उनके लिए कविता एक अति गम्भीरता और निज् आकांक्षा का कर्म था, ‘टाइम पास’ का साधन नहीं। उन्होंने अपने साहित्य सृजन को ‘फूल’ कहकर एक कविता में कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त किया है।

दिये हैं मैने जगत को फूल-फल किया है अपनी प्रतिभा से चलित-चल पर अनश्वर था सफल पल्लवित पल ठाट जीवन का वही
जो ढह गया है।

इस उदाहरण में काव्य के प्रति इनकी गम्भीरता को सहज ही देखा जा सकता है। निराला को मूलत: विद्रोह और प्रेम-श्रृंगार का कवि माना जाता है। कवि बादल राँग में आह्वान करते। हुए कहता है:

जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर,
तुझे बुलाता कृषक अधीर,
ऐ विप्लव के वीर,
चूस लिया है उसका सार,
हाड़ मात्र ही है आधार,
ऐ जीवन के पारावार

इसी प्रकार निराला प्राकृतिक सौन्दर्य और मधुरता का अति सूक्ष्म अंकन अपनी एक उल्लेखनीय कविता में कुछ इस प्रकार से करते हैं:

रँग गई पग-पग धन्य धरा
हुई जग जगमग मनोहरा
वर्ण गन्ध धर, मधु मकरन्द भर
तरन घट की आरूणिमा तरूणतर
खुली रूप-कलियों में पर भी
स्तर स्तर सुपारिसरा।

अन्त में कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य में निराला का अप्रतिम स्थान है। उनका काव्य अपने युग को पार करते हुए आज हमारा सार्थक मार्ग दर्शन की क्षमता रखता है।

Suryakant Tripathi Nirala in Hindi 600 Words

हिंदी साहित्य में सूर्यकांत त्रिपाठी जी का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया।

दारागंज की तंग गलियां आज भी निराली हैं। इसी गली के एक मकान में रहकर ‘निराला’ जी ने अपने साहित्यिक जीवन के तीस-चालीस वर्ष बिताए। वह मकान आज भी उस धरोहर का साक्षात गवाह है, जहां से सरस्वती की अविरल धारा बही। गंगा-यमुना तट पर बसा यह मोहल्ला असल में संगम स्थल था। उनके उस छोटे से मकान को राष्ट्रीय स्मारक बनाये जाने की मांग राष्ट्रपति तक भेजी जा चुकी है, जहां कभी कवियों का जमघट लगता था, कविता किलकारियां भरती थीं, लेकिन सब फाइलों में गुम हो गई हैं और स्मृतियों के नाम पर मकान में ताला लटक रहा है। मानो कह रहा होः

‘अभी न होगा मेरा अंत।
अभी-अभी तो आया है, मेरे वन मृदुल वसंत।
अभी न होगा मेरा अंत।’

बसंत पंचमी और निराला जी का संबंध बड़ा अद्भुत था। उस दिन उनके घर पर साहित्यकारों का जमावड़ा न लगे, यह कैसे हो सकता है। हर साहित्यकार की मंशा होती थी उस दिन कैसे दारागंज पहुंचा जाए। वरिष्ठ साहित्यकार मार्कण्डेय जी बताते हैं कि उस समय हम लोग उम्र में काफी छोटे थे। फिर भी वसंत पंचमी पर उनके घर अवश्य जाया करते थे। उस दिन भी वही मुद्रा रहा करती थी। लंबी-चौड़ी काया, नंगे बदन व एक चौकी पर बैठ जाते थे और हम लोग दरी पर नीचे। उस दिन वे अपनी कोई न कोई रचना अवश्य सुनाते थे। एक बार हम लोगों के साथ महान कवयित्री विद्यावती सिन्हा ‘कोकिल’ अपनी जन्म दिन पर आ पहुंचीं। उन्हें देखकर निराला जी बेहद प्रसन्न हुए और बैठते ही बोले- अरे कोकिल, कोई गीत सुनाओ? कोकिल ने बड़े ही सुंदर कंठ से अपनी रचना सुनाई:

सखि रस बरसै। औ मैं भींगू।
गीत लंबा था, स्वर बेहद मधुर।

निराला जी थोडी देर तक आंख बंद कर सुनते रहे, फिर एकाएक उठे और बाहर चले गये। गीत खत्म हुआ। सब लोग उनका इंतजार करने लगे। सबको एक ही उत्सुकता थी कि आखिर बीच में उठकर गये तो कहां? कोई बोल नहीं सका था।

आखिर कुछ समय बाद एक हाथ में मिठाई का डिब्बा और दूसरे में एक साड़ी लेकर वह कमरे में प्रकट हुए और दोनों ही चीजें विद्यावती को भेंट की। तभी किसी मित्र ने आग्रह किया कि निराला जी, आप भी कोई गीत सुनाएं। हर वसंत पंचमी पर वह कोई न कोई गीत जरूर सुनाते थे और उन्होंने इतने सुन्दर लय में गीत गाया कि आज भी वह दृश्य नहीं भूला जाता है।

इसी तरह एक दिन पृथ्वी राज कपूर अपनी नाट्य मंडली के साथ इलाहाबाद पधारे। संयोग से वसंत पंचमी का दिन था। लोग उन्हें निराला जी के घर ले गए। जाते ही निराला जी के आगे शाष्टांग प्रणाम किया। शरीर से निराला भी कुछ कम नहीं थे, सो उन्होंने दोनों हाथ भर पृथ्वीराज कपूर को उठाया और बोले कसरत करते हो? पृथ्वीराज के मुंह से निकला: “हां कभी कदा।” निराला जी ने पीठ थपथपाई और कहा: “जरूर किया करो।”

उनकी अलमस्ती का हाल अजब-गजब का था। अकेले कहीं जाते नहीं थे। महादेवी के ही बस में था कि वह उन्हें कहीं ले जाएं। मैनपुरी में एक समारोह था। राज्यपाल कन्हैया लाल मणिक लाल ‘मुंशी’ को भी उस समारोह में आना था। आकाशवाणी को उनकी कविता का सीधा प्रसारण करना था। सभी के हाथ-पांव फूल रहे थे कि कवि निराला जी कविता पढ़ेंगे भी या नहीं। महादेव जी के आग्रह पर जब वह राजी हुए तो उनके चारों ओर माइक लगाया गया, क्योंकि वह कभी इस ओर घूम कर कविता पढ़ते थे तो कभी उस ओर।

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