Urban Property in Hindi शहरी संपत्ति

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Essay on Urban Property in Hindi

hindiinhindi Urban Property in Hindi

पंडित जवाहरलाल नेहरु ने संविधान निर्माण के कुछ समय पश्चात्, सन् 1954 के आसपास भारत को एक समाजवादी देश कह कर संबोधित किया था। उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को संबोधित करते हुए कहा था कि भारत अपना सामाजिक और आर्थिक विकास सामाजिक और समाजवादी आदर्शों और मूल्यों के अनुरुप कर रहा है और करता रहेगा, ताकि भविष्य में वह स्वयं को एक समाजवादी देश के रूप में सम्पूर्ण विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर सके। पंडित नेहरु का यह राष्ट्रीय आदर्श भारतीय समाज को देखते हुए जितना महान और अनिवार्य था, उसे स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं दिखाई पड़ती है। सचमुच यह बात तो स्वयं सिद्ध ही है। किन्तु इस राष्ट्रीय आदर्श को प्राप्त करने की सम्पूर्ण प्रक्रिया में अनेक सामाजिक और ऐतिहासिक समस्याएँ थीं, उन्ही समस्याओं में से एक बड़ी समस्या थी – शहरी संपत्ति की समस्या।

हम सबने अपने आस-पास प्राय: इस वास्तविकता को मूर्त रूप में देखा है जैसे कि कोई आदमी अत्यंत दरिद्र अवस्था में, मैले-कुचैले कपड़े पहने, गरीबी और लाचारी की मार झेल रहा है, दर-दर की ठोकरें खा रहा है। न तो उसके पास अपने खाने-पहनने के लिए अनिवार्य संसाधन है और न ही उसकी हैसियत ऐसी है कि वह अपने बच्चों के जीवन को उन्नत बनाने के लिए, उनके लिए समुचित शिक्षा आदि की व्यवस्था कर सके। इस प्रकार उसका समूचा परिवार भी एक नरक की जिंदगी जीने के लिए सदैव बाध्य बना रहता है। इसी के साथ हमने यह भी महसूस किया है कि हमारे इसी समाज के कुछ ऐसे भी लोग हैं जो हमारे समाज में फैली इस भयंकर गरीबी, जहालत और बेकारी के बावजूद एक अति संपन्न जीवन का सुख भोग रहे हैं। समाज का 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा ऐसे ही भयंकर गरीबी के कुचक्र में फंसा हुआ है। भारतीय समाज की आबादी आज 1 अरब से भी ऊपर पहुँच गयी है। इस समाज का सिर्फ 10 प्रतिशत हिस्सा ऐसी है जो जीवन में ऐसे शाही सुखों का यापन और उपभोग कर रहा है, जिनकी कल्पना मात्र भी इसी समाज का गरीब तबका नहीं कर सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा समाज आर्थिक विषमता पर खड़ा हुआ है और यह विषमता भी कोई छोटी-मोटी विषमता नहीं कही जा सकती अपितु यह विषमता तो अत्यंत गहरी है और इसे सामान्य प्रयासों से दूर कर पाना प्राय: असंभव ही कहा जा सकता है। किन्तु भारतीय समाज ने इस स्थिति के अत्यंत विषम और विकराल होने पर भी कभी इसे असंभव नहीं माना, और न ही इस समस्या के समक्ष स्वयं को कभी असहाय ही महसूस किया।

भारतीय समाज के कर्णधारों ने शुरु से ही इस समस्या के मूल में जाने का प्रयास किया। उन्होंने इसे व्यापक विश्लेषण के द्वारा समझने का यथेष्ट प्रयास किया। इस विषम स्थिति के मूल में जिस विकराल समस्या को उन बुद्धिजीवियों ने रेखांकित किया, वह समस्या थी – शहरी सम्पत्ति के केन्द्रीकरण की समस्या। आप ने स्वयं भी इस बात को देखा और अनुभव किया होगा कि हमारे समाज में अनेक ऐसे धन-कुबेर और धन्ना सेठ हैं, जिनके पास अपरिमित रूप से धन और संसाधन मौजूद हैं। उन्होंने अपने पास असीम धन का संचय कर रखा है और यह धन ऐसा है जो उन्होंने ईमानदारी और अपने पवित्र परिश्रम से अर्जित नहीं किया है अपितु वह धन उनके कुत्सित जीवन-व्यवहारों का कुत्सित और घृणित फल होता है। उस अपरिमित धन का संचय उन्होंने हजारों मनुष्यों के वांछित हकों को नष्ट कर के प्राप्त किया होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि इन धन कुबेरों की यह अपरिमित धन-राशि, कोटि-कोटि मानवों के पेट का अन्न छीन कर उनके अपने संसाधनों को हड़प कर अनैतिक और गैर कानूनी रूप से एकत्र की गयी होती है। एक मनुष्य को अपने सामान्य जीवन-यापन के लिए स्वाभाविक रूप से जितने संसाधनों की अनिवार्यता होती है, इन धन कुबेरों के पास उससे कहीं ज्यादा संसाधनों का अमानवीय संचय होता है। यह धन, कालाबाजारी, भ्रष्टाचार, शोषण और हेरा-फेरी से अर्जित किया हुआ धन होता है। यह बात प्राकृतिक रूप से बिल्कुल सत्य है कि एक सामान्य मनुष्य अपने परिश्रम से जितने धन का संचय कर सकता है, वह परिमाण में उतना ही होता है, जितना कि उसकी अपनी आवश्यकताओं का होता है। अपनी स्वाभाविक आकांक्षाओं से अधिक धन संचय करने के लिए उसे निश्चित रूप से समाज के अन्य लोगों के पेट की रोटी छीननी पड़ती है।

संवैधानिक एवं प्रशासनिक स्तर पर सरकार ने राष्ट्रीयकरण की नीति ग्रहण करके इस विकराल समस्या से निपटने का व्यापक प्रयास किया। इसी के साथ सरकार ने अन्य अनेक ऐसी सामाजिक – आर्थिक नीतियों को भी ग्रहण किया जिनमे समाज में आर्थिक-सामाजिक विषमता को कम किया जा सके। महात्मा गांधी ने अपने जीवन में निरन्तर यही प्रयास किया कि मानवीय स्तर पर सारे समाज को प्रेरित कर इस वैषम्य को दूर किया जाए। उनका यह प्रयास बहुत कुछ सफल भी हुआ। किन्तु आज भी इस बात की अनिवार्यता बराबर बनी हुई है कि शहरी सम्पत्ति का सीमांकन किया जाए और सम्पत्ति का अधिक से अधिक राष्ट्रीयकरण करके, अतिरिक्त पूंजी जो समाज में उपलब्ध है, उसका उपयोग अन्य सामाजिक-आर्थिक योजनाओं में किया जाए, ताकि मानवीय विकास के साथ राष्ट्रीय विकास की आदर्श स्थिति भी प्राप्त की जा सके।

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