Essay on Patriotism in Hindi देश भक्ति पर निबंध

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Essay on Patriotism in Hindi

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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘चिंतामणि’ शीर्षक के अंतर्गत अपने निबंध संग्रह में एक स्थान पर लिखा है: “यदि देश-प्रेम के लिए हृदय में जगह बनानी है तो देश के स्वरूप से परिचित और अभ्यस्त होना पड़ेगा। बाहर निकलो तो आँखें खोलकर देखो कि खेत कैसे लहलहा रहे हैं, नाले झाड़ियों के बीच से कैसे बह रहे हैं, टेसू के फूलों से वनस्थली कैसी लाल हो रही है, चौपायों के झुंड कैसे चरते हैं, चरवाहे कैसे तान लड़ रहे हैं, अमराइयों के बीच से झाँकते गाँव कैसे लग रहे हैं। उनमें घुसो, देखो क्या हो रहा है। जो मिलें उनसे दो-दो बातें करो, उनके साथ किसी पेड़ की छाया के नीचे घड़ी-आधा-घड़ी बैठ जाओ और समझो कि ये सब हमारे हैं। इस प्रकार जब देश का रूप तुम्हारी आँखों में समा जायेगा, तुम उसके अंग-प्रत्यंग से परिचित हो जाओ, तब तुम्हारे अन्त:करण में इस इच्छा का उदय होगा कि वह हमसे कभी न छूटे, वह सदा हरा-भरा और फूला-फला रहे। उसके धन-धान्य की वृद्धि हो, उसके सब प्राणी सुखी रहें।”

वस्तुत: देश के समग्र स्वरूप और वास्तविकता को समझे बिना देशभक्ति असंभव है। देश भक्ति निज् देश के इसी समग्र स्वरूप के प्रति हार्दिक और भावनात्मक-अभिव्यक्ति होती है। देशभक्ति, देश के प्रति अपना सर्वस्व निछावर करने की प्रबल आंकाक्षा का ही दूसरा नाम है निज् स्वार्थों और तुच्छ आंकाक्षाओं से ऊपर उठकर, अपने देश और समाज के हितार्थ हर प्रकार के कष्टों को सहते हुए, अपना तन, मन और धन अर्पित करने की भावना ही सच्ची देशभक्ति कहलाती है।

हमारा भारत देश अनेकानेक देशभक्तों के गौरवशाली इतिहास से भरा पड़ा है। महाराणा प्रताप, शिवाजी, राजा राममोहन राय, बाल गंगाधर तिलक, सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी आदि देशभक्तों ने भारत का गौरव बढ़ाया है। अनेक ऐसे ही देशभक्त और वीर पुरूष हुए हैं जिन्होंने अपने देशभक्ति पूर्ण कार्यों से हमारे देश और समाज को विदेशी पराधीनता और गुलामी से सदैव मुक्त रखने का सतत् प्रयोजन अपने हृदय में सदैव रखा है। भक्त-कवि रसखान ने देश-भक्ति की अपने एक पद में कुछ इस प्रकार प्रकट किया है:

“नैनन सों रसखान जबै ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
केतिक मे कल धौत के धाम करील के कुन्जन ऊपर बारौं।”

कहने का अभिप्राय यह है कि सच्ची देश-भक्ति की भावना में, हमें निज् देश के प्रति, उसके प्राकृतिक-भौगोलिक आकार-प्रकार के प्रति एक प्रभावशाली ललक और जुड़ाव की उत्कट अभिलाषा दिखाई पड़ती है। अपने प्राकृतिक वैभव और सौन्दर्य के प्रति अटूट प्रेम, देश-भक्ति और देश-भक्त दोनों की प्रधान विशेषता हैं।

देश-भक्ति की भावना कोई एकांगिक भावना नहीं, इसमें कहीं अधिक व्यापकता होती है। वह एक साथ अनेकानेक स्तरों पर गतिशील रहती है। भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान अनेकानेक देशभक्तों ने देशभक्ति के उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किए। जिसमें देश-भक्ति की भावना से ओत-प्रोत देश-भक्त, एक तरफ अंग्रेज़ों के विरूद्ध अपनी राजनैतिक-स्वाधीनता प्राप्त करने के उद्देश्य से आन्दोलन करते हैं, वही वे अपने ही समाज की उन विकृतियों और असंगतियों के खिलाफ़ भी आन्दोलन करते हैं, जो भारतीय समाज की चूलें हिलाने का कार्य कर रहीं थीं। इसी के साथ वे धर्म, जाति, क्षेत्र आदि की भिन्नताओं को भुलाकर, अपने देश के हित में एकजुट होने का, जनता से आग्रह भी कर रहे थे। अत: देश-भक्ति की भावना में देश की समग्रता अभिव्यक्त होती है – यह यहाँ पर सहज ही परिलक्षित होता है।

देश-भक्ति की भावना, कुछ ऐसे महान–पुरुषों के द्वारा मूर्तरूप ग्रहण करती है जो अपने जीवन को एक विकट और अथक साधना का रूप देते हैं और पूरी कठोरता से स्वयं के जीवन में उस साधना का अनुपालन करते हैं। संतोष-वृति’ को इसी कारण एक देशभक्त की परम विशेषता कहा गया है। महात्मा तुलसीदास ने एक स्थान पर इस संतोष-वृत्ति का उल्लेख कुछ इस प्रकार किया है।

कबहुँक हाँ यदि रहनि रहौंगो
यथा लाभ सन्तोष सदा काहू सों कछु न चहौंगो।”

इसी के साथ देश-भक्ति की एक और अनिवार्य विशेषता है, अपने सर्वस्व को देश हितार्थ अर्पित करने की शक्ति। इसके अभाव में देश-भक्ति की भावना की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हिन्दी के एक प्रसिद्ध कवि की निम्नोक्त काव्य-पंक्तियां इस भावना की अत्यंत ज्वलंत प्रमाण है:

“मुझे तोड़ लेना वनमाली, उसमें देना तुम फेंक।
मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पर जावें वीर अनेक॥”

वस्तुत: हमारा इतिहास इस बात का साक्षी है कि देश या समाज का समुचित-विकास, देश में निवास करने वाले देश-भक्तों और उनके हृदय में विद्यमान देश-भक्ति की भावना का ही परिणाम होता है। इस अभाव में देश के विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। अपने देश के विकास, उसकी स्वाधीनता की रक्षा करने की भावना के चलते अपने प्राणों तक को न्यौछावर कर देना देश-भक्तों का इतिहास रहा है। गाँधीजी ने भी कहा था कि किसी देश में जितने ज्यादा देशभक्त होंगे, उस देश का विकास भी उतना ही होगा।

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