Essay on Governor in Hindi राज्यपाल पर निबंध

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Essay on Governor in Hindi

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राज्यपाल पर बढ़ता विवाद

भारतीय राजनीति में राज्यपाल पद को लेकर तमाम तरह की बातें हो रही हैं। राज्यपाल पद की एक गरिमा होती है, उसे बनाए रखा जाना चाहिए। राज्यपाल के पद पर ऐसे लोगों को बैठाया जाना चाहिए, जो किसी क्षेत्र में विशिष्ट स्थान रखते हों।

डॉ अंबेडकर ने 3 अगस्त, 1949 को संविधान सभा में कहा था, ‘हमारे संघीय ढांचे में राज्यों को जो क्षेत्र सौंपा गया है, उसमें उनकी प्रभुसत्ता वैसी ही होगी जैसे केन्द्र की अपने क्षेत्र में।’ विधिशास्त्री सरवाई ने निष्कर्ष निकाला कि संविधान में राज्यों को जो क्षेत्र सौंपा गया है, वह किसी प्रकार से कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसकी पुष्टि उच्चतम न्यायालय ने शमशेर सिंह के मामलें (1975) में कर दी थी।

केन्द्र द्वारा राज्य प्रशासन की देख-रेख का प्रावधान संविधान में नहीं है। संविधान सभा में अनुच्छेद 356-357 पर चर्चा के दौरान डॉ। कुजरू ने प्रश्न किया, ‘क्या केन्द्र सरकार को अधिकार दिया जा रहा है कि वह राज्य के मामले में अच्छा प्रशासन सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप कर सके?’ डॉ। अंबेडकर का उत्तर था कि केन्द्र को यह अधिकार नहीं होगा। कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया कि राज्य में शांति और व्यवस्था के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो जाये, तो केन्द्र को अधिकार होना चाहिए कि वह राज्य का प्रशासन अपने हाथ में ले ले। इस प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर दिया गया था। सारांश यह है कि राज्यपाल ऐसे राज्य का मुखिया हैं, जिसके प्रशासन में केन्द्र केवल संविधान में दिये गये विशिष्ट प्रावधानों के अंतर्गत या राज्य के। संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में ही हस्तक्षेप कर सकता है।

राज्यपाल पद के संबंध में सबसे पहले विचार हुआ था, संविधान सभा की प्रांतीय संविधान समिति व संघीय संविधान समिति की संयुक्त बैठक में। इसके अनुसार, हर प्रांत के राज्यपाल को सीधे जनता द्वारा चुनाव होना था। कार्यकाल 4 वर्ष था। उसे महाभियोग प्रक्रिया द्वारा ही हटाया जा सकता था। आकस्मिक रिक्ति के लिए, प्रांतीय विधान सभा चुनाव द्वारा भरा जाना था। राज्यपाल की चार महीने की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति किसी को नियुक्त कर सकता था। जब संविधान सभा में इस रिपोर्ट पर बहस हुई, तो राष्ट्रपति के द्वारा नियुक्ति के प्रावधान को निरस्त कर दिया गया और गोविंद बल्लभ पंत के संशोधन को, कि हर प्रांत में एक ‘डिप्टी गर्वनर’ होना चाहिए, जो राज्यपाल की अनुपस्थिति में उसका कार्य करे, स्वीकार किया गया। संशोधन का कारण था, पूरे प्रकरण में राष्ट्रपति की भूमिका नहीं होनी चाहिए और उसके द्वारा नियुक्ति ‘प्रांतीय स्वायत्तता के सर्वथा प्रतिकूल होगी।’

दूसरे चरण में, यह विषय प्रारूप समिति के समक्ष प्रस्तुत हुआ। समिति की रिपोर्ट संविधान सभा को 21 फरवरी, 1948 को प्रेषित की गई। समिति के अध्यक्ष डॉ। अम्बेडकर थे। समिति ने राज्यपाल के चुनाव का एक प्रस्ताव पारित किया। इसके अनुसार प्रांतीय विधान सभा द्वारा चुने गये चार व्यक्तियों में से राष्ट्रपति किसी एक को राज्यपाल नियुक्त कर सकता था। अंबेडकर का कहना था कि इन दोनों विकल्पों का आधार चुनाव ही है उनका अपना मत था कि प्रारूप समिति द्वारा प्रस्तुत किया गया विकल्प राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति किये जाने के विकल्प से बेहतर है।

संविधान सभा में इस रिपोर्ट पर बहस 15 महीने बाद हुई (30-31 मई 1949)। तब तक परिस्थितियां कुछ बदल गई थीं और यह सुनिश्चित हो चुका था कि राज्यपाल का पद राज्य के संवैधानिक मुखिया का होगा। पहले यह विचार था कि कुछ विषयों पर उसे अपने विवेक से कार्य करने का अधिकार होगा, वह अपने मंत्रिमंडल की राय से ही कार्य करेगा। दूसरे शब्दों, में पद मुख्यतः अलंकारिक होगा। संविधान सभा में दोनों विकल्पों पर कई संशोधन प्रस्तुत किये गए। एक बिल्कुल अलग प्रकार का संशोधन प्रस्तुत किया गया कि राज्यपाल की नियुक्ति सीधे राष्ट्रपति द्वारा की जाए। इसका जोरदार विरोध हुआ। राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति के संबंध में कई आश्वासन दिए गए। प्रारूप समिति के सदस्य टी-टी- कृष्णामचारी ने कहा कि राज्यपाल ‘केन्द्र सरकार का प्रतिनिधि नहीं होगा।’ उन्होंने इस पर भी जोर दिया कि राज्यपाल की नियुक्ति करते समय राज्य सरकार से पूरी तरह विचार विमर्श किया जाएगा। प्रारूप समिति के सदस्य अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर और पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि नियुक्ति राज्य सरकार की ‘स्वीकृति’ से ही होगी।

राज्यपाल अपने पद पर राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत ही बना रह सकता है – इस प्रावधान का भी विरोध हुआ। डॉ अंबेडकर के संक्षिप्त उत्तर से स्पष्ट है कि राज्यपाल को केवल गंभीर अपराध के आधार पर ही समय से पहले हटाया जायेगा। संविधान में सभी संवैधानिक पदों को धारण करने वालों – जैसे राष्ट्रपति, उच्चतम और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, भारत का नियंत्रक और महालेखापरीक्षक, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष व सदस्य है को उनके पदों से हटाने के प्रावधान दिए गए हैं। राज्यपाल को इस प्रतिष्ठा से वंचित रखने का कोई कारण समझ में नहीं आता।

राष्ट्रपति द्वारा गठित भगवान सहाय कमेटी ने भी इसी प्रकार का निष्कर्ष राष्ट्रपति को प्रेषित किया था। रघुकुल तिलक मामले में संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाने और उसके प्रसाद पर्यंत अपने पद पर बने रहने के इस प्रावधान से राज्यपाल को केन्द्रीय सरकार का अधीनस्थ नहीं बनता।

यह पहली बार नहीं है, जब किसी राज्यपाल संबंधित स्थिति पर असंतोष प्रकट किया गया हो। प्रशासनिक सुधार आयोग और सरकारिया आयोग ने भी इस संबंध में अपनी चिंता व्यक्त की थी, पर केन्द्र सरकार पर कभी इन आलोचनाओं का प्रभाव नहीं पड़ा। रघुकुल तिलक मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय (1979) के कुछ ही महीनों के बाद तत्कालीन गृहमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने घोषणा की कि राज्यपाल का पद राजनैतिक है और नई सरकार के पद ग्रहण करने पर उसे स्वतः अपना पद त्याग देना चाहिए। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने कई कदम आगे बढ़कर राष्ट्रपति वेंकटरमन से सब राज्यपालों को पत्र लिखवा दिया कि वे अपना त्याग पत्र भेज दें। राजग सरकार के गृहमंत्री ने फातिमा बीबी के साथ जो व्यवहार किया वह असंवैधानिक ही नहीं, असभ्य भी था। समय-समय पर बनी कांग्रेस सरकारों और स्वयं कांग्रेस पार्टी का दृष्टिकोण अच्छा नहीं रहा है। सरकारिया आयोग के समक्ष उसका प्रतिवेदन था कि राज्यपाल के पांच साल के कार्यकाल की कोई ‘वैधानिक या संवैधानिक गारंटी नहीं है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार का दृष्टिकोण और भी कठोर हो गया है। उच्चतम न्यायालय में याचिका किए जाने होने के संदर्भ में सरकार का कहना है कि संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि राज्यपाल की नियुक्ति में राज्य सरकार से विचार-विमर्श किया जाएगा। राज्यपाल को कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाया नहीं जा सकता। यह पार्टी जिसे सदा अपना सर्वोच्च नेता मानती रही है, उसने संविधान सभा में अपने 31 मई, 1949 के भाषण में इस पद की जो परिकल्पना की थी, उसे इसने बिल्कुल निरस्त कर दिया है।

इस परिस्थिति में कोई सर्वमान्य राष्ट्रीय नीति बनाना आसान नहीं लगता। स्थिति में सुधार केवल संविधान में संशोधन करके ही संभव है। दो प्रावधान तो नितांत आवश्यक हैं। राज्यपाल की नियुक्ति में संबंधित राज्य विधानसभा की समुचित भूमिका होनी चाहिए और अन्य संवैधानिक पदों के समान राज्यपाल को पदच्युत करने की प्रक्रिया भी संविधान में लिखी जानी चाहिए। पर दिन-प्रतिदिन बौने होते जा रहे राजनेताओं से ऐसी कोई आशा करना एक बड़ी भूल होगी।

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