Essay on Liberalisation in Hindi उदारीकरण पर निबंध

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Essay on Liberalisation in Hindi

उदारीकरण और सकारात्मक राजनीति

‘उदारीकरण’ शब्द का प्रयोग आज-कल बहुलता के साथ हो रहा है। सच तो यह है कि आज के समय और समाज को ‘उदारवाद’ का समय तक कहने की पद्धति भी चल पड़ी है। किन्तु जैसा हम सभी यह बात जानते हैं कि यह तथाकथित उदारवाद कोई सामजिक अथवा सांस्कृतिक संकल्पना न होकर, मूलत: अर्थ-जगत से संबंधित अवधारणा है। डॉ सच्चिदानंद सिन्हा ने इस उदारवाद के संदर्भ में ठीक ही लिखा है: “आज जब स्वतंत्र व्यापार की बात होती है तो उसका एक भाग अर्थ होता है सबसे सशक्त व्यापारिक प्रतिष्ठानों के लिए उन सारे क्षेत्रों को खोल देना जो अब तक इनकी पहुंच के बाहर रहे हैं। पूंजीवाद के विकास के काल में स्वतंत्र व्यापार का सिद्धान्त छोटे क्षेत्रों के लिए सीमित था। पश्चिम के नवोदित पूँजीवादी देशों के भीतर या उन्हीं देशों के बीच यह एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के तहत ही वैश्विक बना है। इसके विकास के इतिहास पर नजर डालने से हम इसकी शक्ति के स्रोत को समझ सकते हैं और इस प्रकार हम इस भ्रम से भी मुक्त हो सकते हैं कि उदारीकरण शब्द के पीछे कोई उदार मन्तव्य है।”

यह उद्धरण उदारीकरण की समसामयिक प्रक्रिया और तात्विक रूप से उदारवाद को समझने में हमारी सहायता करता है । जैसा कि हमने पहले ही कहा कि उदारवाद की संकल्पना मूलत: अर्थजगत् से संबंधित संकल्पना और अवधारणा है। किन्तु यह ‘मन्तव्य’ में उदार न होकर अत्यंत विकट रूप से शोषक मनोवृत्ति का प्रतिबिम्ब है।

आधुनिक युग को राजनीति के लोकतांत्रिक-स्वरूप के प्रचलन का युग माना जाता है। भारतीय संदर्भ में यह बात सर्वाधिक लागू होती है। जिस दौरान भारतीय राजनीति का स्वरूपउद्घाटन हो रहा था, वह समय भारतीय इतिहास में स्वाधीनता के आन्दोलन और संग्राम का युग कहलाता है। उस समय एक औपनिवेशिक साम्राज्यवादी शासन से मुक्ति के लिए सम्पूर्ण भारतीय समाज संगठित और एकजुट हो रहा था। उस भारतीय समाज को संगठित और एक जुट करने का कार्य जो महनीय शक्ति कर रही थी वह थी राजनीति। तत्कालीन भारतीय समाज की राजनीति अपने समूचे वर्तमान का सजग और समग्र प्रतिनिधित्व कर रही थी।

इसी का परिणाम है कि तत्कालीन भारतीय समाज अपनी मुक्ति और सामाजिक परिवर्तन के लिए भारतीय राजनीति पर पूर्णत: निर्भर होता हुआ दिखाई पड़ता है।

इस प्रकार की राजनीति को कल्याणकारी और सकारात्मक राजनीति का नाम दिया जाता है। किन्तु इधर कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति के वास्तविक स्वरूप में अद्भुत परिवर्तन आए हैं, और ये परिवर्तन इतने प्रभावशाली रहे हैं कि इन्होंने राजनीति के प्रति एक अलग दृष्टिकोण को भी जन्म दे दिया है।

अब तक राजनीति के भ्रष्ट और विसंगत होने पर चिन्ता जताई जा रही थी और आज इसी के साथ राजनीति में नयी अद्भुत विडम्बना भी उभर रही है। यह विडम्बना है – राजनीति का समाज के प्रति संवेदनशील होना। भारतीय राजनीति समाज के प्रति निरन्तर उदासीन और विमुख होती जा रही है।

आज के समय की आर्थिक गतिविधियां किसी क्षेत्र या देश विशेष तक सीमित न रहकर वैश्विक हो गयी हैं और इन समग्र आर्थिक गतिविधियों को नियंत्रित करने का कार्य विश्व व्यापार संगठन ही करता है, जिसमें सदस्य पूंजीवादी देश और समुदाय के प्रतिनिधि मात्र होते हैं। अत: आज विश्व में जितनी भी आर्थिक गतिविधियां हमें राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई पड़ रही हैं, वे मूलत: पूंजीवादी स्वार्थों की ही नीतियां हैं। इन नीतियों में सामाजिक कल्याण के लिए कोई स्थान नहीं होता हैं।

वस्तुत: हमारी जिस राजनीति पर व्यापक सामाजिक कल्याण और विकास का महनीय भार था वह आज इसी प्रकार की आर्थिक नीतियों को राजनैतिक समर्थन प्रदान करने में लगी हुई हैं। यही स्थिति है, जिसे उदारवादी कहा जाता है और यह राजनीति का हनन करने वाली प्रक्रिया है।

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