निर्गुण साहित्य

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निर्गुण साहित्य

भारत में दार्शनिक चिंतन और विचारणा की एक लम्बी परम्परा रही है। यहां दर्शन का कोई एक रूपी स्वरूप नहीं मिलता अपितु जीव-जगत एवं ब्रह्म के संबंध में परस्पर विरोधी और प्रतिकूल मीमांसाएँ प्राप्त होती हैं। भगवान को एक ओर जहां सगुण माना गया, वहीं उसे निर्गुण ब्रह्म कहकर भी संबोधित किया गया। भारतीय दर्शन जितना गहन और सूक्ष्म रहा है, वह व्यावहारिक स्तर पर उतना ही समन्वयात्मक भी रहा है। यही कारण है कि कतिपय धर्म-गुरुओं ने ईश्वर को एक साथ सगुण और निर्गुण माना है। इनके मतानुसार ब्रह्म सगुणरूप भी हैं और निर्गुण स्वरूप भी। भक्ति-काल के महान भक्त कवि तुलसीदास ने ‘दोहावली’ में लिखा है।

हिम निर्गुन नयनन्हि सगुन, रखना राम सुनाम।
मनहुँ परत सपुर लसत, तुलसी ललित लगाम।।

‘विनयपत्रिका’ में तुलसीदास ने राम के जिन गुणों का चित्रण किया है, उन्हें निर्गुणवादियों ने निर्गुण ब्रह्म के गुण बताए हैं। जैसेः

दुष्ट-विबुधारि-संधात-अपहरन महि मार, अवतार कारन अनूप
अमल अनबथ अद्वैत निर्गुन सगुन ब्रम्ह सुरिन नरभूप-रूपं॥

किन्तु, फिर भी सगुण और निर्गुण काव्य-धाराएं सदा एक साथ विद्यमान रही हैं। भक्तिकालीन साहित्य को आचार्य शुक्ल ने सगुण-निर्गुण काव्य धाराओं में ही विभाजित किया है। भक्तिकालीन काव्य-धारा में निर्गुण काव्य-धारा का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण और प्रधान रहा है। निर्गुण काव्य-धारा का विभाजन दो उप-धाराओं में किया गया है- ज्ञानाश्रयी धारा और प्रेमाश्रयी धारा। इस धारा के प्रमुख कवियों में कबीर, जायसी, रैदास, मलूकदास और नानक आदि प्रमुख रहे हैं। कबीर इस धारा के प्रमुख कवि हैं। डॉ. नगेन्द्र ने निर्गुण भक्ति को रेखांकित करते हुए लिखा है: “निर्गुण भक्ति में गुरु को वही महत्व प्राप्त है, जो साधना के अन्य रूप, ज्ञान मार्ग, सगुण भक्ति या रहस्यवाद में प्राप्त है। सदगुरु की कृपा के बिना साधक एक पग भी नहीं चल सकता। निर्गुण भक्ति में ‘नाम स्मरण’ को भी विशेष महत्व दिया गया है। सगुण धारा के कवि तुलसीदास नाम की महिमा का वर्णन करते हुए उसे राम से भी अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। और कबीर की दृष्टि में भी पंडित वही है जिसने प्रेम का ढाई अक्षर पढ़ लिया है। निर्गुण भक्ति में तो जप की अवस्था से उपर अजपा जप की अवस्था स्वीकार की गयी है, जिसमें सिद्ध पुरुष अनहद शब्द के समान बिना किसी प्रयास के निरन्तर नाम स्मरण करते रहते हैं। निर्गुण भक्ति में दैव्य की भावना को भी वही महत्व प्राप्त है जो सगुण भक्ति में दिखाई देता है। निर्गुण भक्ति का मूल तत्व है: “निर्गुण-सगुण से परे, अनादि अनाम, अजात ब्रह्म का नाम जप। सन्तों ने नाम जप को साधना का आधार माना है। नाम समस्त संशयों और बंधनों को विच्छिन्न कर देता है। नाम ही भक्ति और मुक्ति का दाता है।” निर्गुण धारा एक अति प्राचीन, दार्शनिक एवं साहित्यिक प्रवृति रहा है। कबीर ने लिखा है –

हरि रस पीया जानिए, जो कबहू न जाय सुमार।
मैंमता घूमत फिरै नाहीं तन की सार

निर्गुण भक्ति में अद्वैत-दर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस धारा में ब्रह्म के निर्गुण स्वरूप को मूल आधार के रूप में स्वीकार किया गया है। वस्तुत: इसमें गुरु को गुरु ही वह जीवंत प्राणी होता है, जो इस अद्वैत-ब्रह्म का वास्तविक परिचय भक्त को करवाता है और जब भक्त एक बार ब्रह्म के चैतन्य रूप से परिचित हो जाता है, तब वह नाम-स्मरण का माध्यम अपनाकर उस तक पहुंचता है।

हिन्दी की निर्गुण धारा की एक विशिष्टता है, इस धारा में अभिव्यक्त किया गया मानवतावादी चेतना का व्यापक स्वरूप। इस धारा में मनुष्य को एक समान माना गया है और साथ ही भौतिक संकीर्णताओं और विभेदों को निर्मूलकर उसे ब्रम्ह का रूप मानने पर ही जोर दिया गया है।

वस्तुत: निर्गुण काव्य धारा मध्यकालीन सांस्कृतिक-चेतना का जीवंत प्रमाण है। इस धारा में नयी-नयी सामाजिक-सांस्कृतिक चिन्तन अभिव्यक्त की गयी है। और यही इस काव्य-धारा का मूल्य भी है।

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