Essay on Foreign Direct Investment in Hindi प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर निबंध

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Essay on Foreign Direct Investment in Hindi

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विदेशी निवेश और लघु उद्योग

भारत पर अपने शासन के दौरान अँग्रेज भारतीय समाज पर अनेकानेक प्रकार के जुल्म और अत्याचार किया करते थे। साथ ही वे सदा एक ऐसा जघन्य कर्म भी किया करते थे जिसने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को एक दिन उखाड़ तो फेंका, किन्तु उसमें इतनी देर हो चुकी थी कि भारतीय समाज फिर कभी इसकी क्षतिपूर्ति न कर सका। ब्रिटिश शासन ने अपने पूरे दौर में हथकरघा उद्योग को पतन की ओर ही धकेला।

वस्तुतः भारत में अंग्रेजों का आगमन कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, अपितु एक ऐसा प्रबल आकर्षण था जो उन्हें निरन्तर अपनी ओर खींच रहा था। यह आकर्षण था भारत का व्यापारिक महत्व। सदियों से भारत विश्व के कई देशों के साथ व्यापार करता आ रहा था। अपने समृद्ध संसाधनों के लिए वह इसी के चलते बहुत पहले ‘सोने की चिडिया’ के नाम से जाना जाने लगा था। भारत को सोने की चिड़िया बनाने वाले दो वर्ग के लोग थे। एक तो किसान वर्ग और दूसरा कारीगर। इन्हीं लोगों की कर्मसाधना ने भारत को इतनी उँचे शिखर पर पहुंचा दिया कि विश्व-भर के लुटेरों की निगाहें भारत पर ही आ टिकीं।

आज का युग औद्योगीकरण और भौतिकतावादी प्रवृत्तियों एवं सुख-सुविधाओं का युग है। औद्योगिक प्रतिष्ठानों के अप्रतिम विकास को ही आज राष्ट्रीय विकास और उन्नति का प्रतीक मान लिया जाता है। यह बात सत्य होते हुए भी तब तक पूर्णत: सत्य नहीं कही जा सकती, जब तक भारतीय किसान और कारीगर अपनी दुर्व्यवस्था से मुक्त नहीं हो जाते।

‘गाय सोमिन’ नामक एक फ्रांसीसी चिन्तक ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘भारत की आत्मा’ में एक स्थान पर अत्यंत सारगर्भित शब्दों में लिखा है कि भारतीय समाज का आर्थिक विकास मात्र उदारीकरण की नीतियों और विदेशी निवेश के आधार पर पूर्णत: संभव नहीं होगा। इसका अभिप्राय ठीक यही है कि हमारे घरेलु कुटीर-उद्योगों के सबलीकरण की भी आवश्यकता आज अनिवार्य बनी हुई है। यंत्राधारित उद्योगों के सबलीकरण की आवश्यकता आज अनिवार्य है। साथ ही यंत्राधारित उद्योगों में एक सीमा तक ही जनशक्ति का उपयोग संभव हो सकता है, किन्तु भारत जैसे देश में, जिसका जनसंख्या के मामले में विश्व में दूसरा है, इस प्रकार की। आर्थिक नीतियां कदापि सफल नहीं हो सकती जिनमें न्यूनतम जन शक्ति का ही उपयोग हो सकता हो। अतः जनशक्ति की पर्याप्त उपलब्धता को दृष्टि में रखते हुए हमें अनिवार्यत: भारत के परम्परागत कुटीर एवं घरेलू-उद्योगों को व्यापक रूप से प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है।

गाँधीजी का स्पष्ट मानना था कि सच्ची विकास तभी संभव है जब देश के प्रत्येक नागरिक का श्रम उसमें लगा हो। उनको स्पष्ट संकेत देश के कुटीर एवं लघु-उद्योगों की ओर ही था। उन्होंने ग्राम-स्वायत्तता पर अत्यंत गंभीरता से विचार किया था और इसके लिए उन्होंने ग्राम उद्योगों को महत्व दिये जाने की अनिवार्यता की ओर भी संकेत किया था।

वस्तुतः देश का समाजवादी और समानतावादी विकास एवं उन्नयन तभी हो सकता है जब हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत हो। इसके लिए लघु एवं कुटीर उद्योग को अधिक-से-अधिक बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इस प्रकार के उद्योग अत्यंत सीमित संसाधनों से भी संचालित किये जा सकते हैं और इसको संचालित करने में कोई बड़ी पूंजी नहीं लगानी पड़ती है। व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो उनसे होने वाला लाभ अधिक होता है।

इन उद्योगों के माध्यम से हम न केवल सकल घरेलू उत्पाद को बढ़ा सकेंगे अपितु दिनोदिन अनियंत्रित रूप से बढ़ती महंगाई को भी नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। अत: सरकारी स्तर पर, इस संदर्भ में यथोचित रूप से रणनीति तैयार करने की आवश्यकता है ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था को एक स्थायी सुदृढ़ता प्राप्त हो सके।

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