Essay on Religion and Politics in Hindi धर्म और राजनीति पर निबंध

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Essay on Religion and Politics in Hindi

भारत क्या, संसार के सभी देशों में धर्म का महत्त्व शुरू से ही रहा है और आज भी यह एक स्वर से स्वीकृत है। राजनीति क्या, जीवन का प्रत्येक कार्य धर्मपूर्वक किया जाना चाहिए, यह एक व्यापक मान्यता है। लेकिन जैसे-जैसे अर्थवादी नीतियों और व्यक्तिगत स्वार्थों की प्रधानता होती गई, धर्म जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ता गया। उस का प्रयोग एवं उपयोग केवल स्वार्थ पूर्ति के लिए ही किया जाने लगा। आज स्थिति-कम-से-कम भारत में यह बन गई है कि जिन लोगों ने अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए धर्म का सब से ज्यादा उपयोग-बल्कि दुरुपयोग किया है, वही यह कहने लगे हैं कि धर्म का नाम लेकर राजनीति नहीं की जानी चाहिए।

भारत को धर्म परायण देश माना गया है। यहाँ के सम्राटों ने धर्म पालन के लिए अपने तक को त्याग दिया। राजा के या राजनीति के निर्वाह को राजधर्म एवं धर्म का निर्वाह माना। अर्थ, काम और मोक्ष की साधना को भी एक प्रकार की धर्म-साधना ही माना जाता रहा। उसी देश में आज बद्नीयती, भ्रष्टाचार, बेईमानी, स्वार्थ, सत्ता की भूख इस सीमा तक बढ़ गई है कि आज राजनीति अराजकता और अराजक तत्वों का खेल बन कर रह गई है। उस का उपयोग केवल अपने या फिर अपने गिरोह के निहित स्वार्थों की पूर्ति एवं सत्ता की भूख मिटाने मात्र के लिए किया जा रहा है। धर्म को राजनीति से निकाल दिया जाए, तो अराजकता के खुलकर खेलने के सिवा बाकी क्या बचा रह पाएगा?

भारतीय नीति शास्त्र में राजा को भी धर्मपूर्वक राज करने का आदेश है। जन सेवा को सब से श्रेष्ठ धर्म माना गया है। लोगों के सुख-दु:ख में सहभागी बनने को भी धर्म कहा गया है। खेद का विषय है कि अपनी अज्ञानता और स्वार्थ परायणता के कारण आज उसी धर्म का राजनीति से बहिष्कार करने का नारा लगाया जा रहा है। वास्तव में धर्म को नहीं साम्प्रदायिकता को राजनीति और जीवन से बाहर निकालने की आवश्यकता है।

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