Essay on Indian Rural Life in Hindi – भारतीय ग्रामीण जीवन पर निबंध

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Essay on Indian Rural Life in Hindi
भारतीय ग्रामीण जीवन पर निबंध/ Essay on Indian Rural Life in Hindi

Essay on Indian Rural Life in Hindi

भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां की अधिकांश जनता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में कृषि से जुड़ी हुई है। इस तरह भारत एक गाँवों का देश है। भारत की आत्मा गांवों में बसती है। यहां की सभ्यता और संस्कृति मूलत: ग्रामीण है। गाँवों की संख्या देश में सबसे ज्यादा है। गांव छोटे और बड़े दोनों तरह के हैं। छोटे-छोटे गाँवों में दस-बीस घर से लेकर 100 – 200 घर तक हो सकते हैं। इसके बाद कस्बे, नगर तथा महानगर हैं। महानगरों की संख्या तो उंगलियों पर गिनी जा सकती है। एक गाँव कुछ झोपड़ियों और घरों का एक समूह होता है जिसके चारों ओर खेत-खलिहान होते हैं, चरागाह और बाग-बगीचे या फिर चाय, रबड़ आदि के बाग होते हैं। गाँव के लोग फल, सब्जियां, अनाज, आदि उगाते हैं, पशुपालन करते हैं, कुटीर उद्योग चलाते हैं या फिर मजदूरी करते हैं।

गाँव के लोग प्रकृति की गोद में सीधा, सरल, सहज और प्राकृतिक जीवन जीते हैं। वहां शहर की-सी भागदौड़ और भीड़भाड़ नहीं होती। गांवों के जीवन में सरलता और संतोष होता है। उनमें परस्पर सहानुभूति, भाईचारा और सहयोग की भावना होती है। लोग थोड़े में ही अपना निर्वाह करना जानते हैं और चैन की नींद सोते हैं। पारस्परिक कलह, द्वेष, ईर्ष्या आदि का उनमें अभाव होता है। इस प्रकार अपराध भी न्यूनतम होते हैं। उन में नैतिकता और ईश्वर का भय भी होता है। स्वभाव से ग्रामीण लोग अधिक धार्मिक, दयालु तथा सहृदय होते हैं। एक प्रसिद्ध अंग्रेज कवि ने उचित ही कहा है कि “ईश्वर ने देहात बनाया और इंसान ने नगर” (God made the country and man the town)। इसका अर्थ है कि नगरों का जीवन कृत्रिम व जटिल है जबकि ग्रामीण जीवन सरल और स्वाभाविक है।

ग्रामीण लोग प्रातः सूर्य उदय होने से पहले उठने के आदि होते हैं। उस समय वातावरण शांत, स्फूर्तिदायक, प्रेरणाप्रद और मनोरम होता है। सूर्य की सुनहरी किरणों में नहाया हुआ सारा ग्राम्य वातावरण स्वर्ग जैसा सुन्दर लगता है। पक्षियों की मधुर चहचहाहट कानों में मधु घोलती रहती है। वायु शुद्ध और भीनी-भीनी होती है। गांव के मन्दिर से आने वाली घंटे-घड़ियाल की ध्वनि भी कानों को प्रिय लगती। है। सुबह होते ही किसान अपने हल-बैलों के साथ खेतों की ओर चले जाते हैं। वहां दिनभर अपने काम में व्यस्त रहते हैं और फिर शाम को घर लौटते हैं। दोपहर को बहुत साधारण भोजन कर थोड़ा विश्राम करते हैं। उनकी दिनचर्या जितनी सरल है, उतनी ही कठिन भी। कैसा भी मौसम हो, वे परिश्रम में लगे रहते हैं।

गाँवों में किसानों के अतिरिक्त मिस्त्री, कारीगर, चमड़े का काम करने वाले, लुहार, बुनकर, दर्जी आदि भी होते हैं। परचून आदि की छोटी-मोटी दुकानें भी होती हैं। ये लोग अपने-अपने काम में व्यस्त रहते हैं। गांव के लोग विभिन्न देवीदेवताओं को पूजते हैं। इसका पंडे तथा पुजारी लोग अनुचित लाभ उठाते हैं तथा लोगों को उल्लू बनाते रहते हैं। गांव के लोग संगठित होते हैं। वे एक-दूसरे को भलीभांति जानते हैं तथा एक-दूसरे के सुख-दुख में सदा हाथ बंटाते हैं। गांवों में यदि किसी के घर कोई मेहमान आता है तो वह एक प्रकार से सारे गांव का ही मेहमान होता है।

आपसी सहयोग व समझ के कारण सामाजिक सुरक्षा भी अच्छी होती है तथा सामान्यतः चोरी, ठगी आदि की समस्याएं सामने नहीं आतीं। शाम को लोग चौपाल में इकट्ठे होकर आपस में विचारों का लेन-देन करते हैं, अपनी समस्याओं पर विचार करते हैं और उनके समाधान ढूंढते हैं। गांवों में उत्सवों, मेलों, त्योहारों आदि का भी अपना ही रंग-ढंग और आनन्द होता है। लोग बढ़-चढ़ कर इनमें सामूहिक रूप में भाग लेते हैं। गांवों में साप्ताहिक बाजारों की भी बड़ी धूम रहती है। गांव प्राय: आत्मनिर्भर होते हैं और अपनी जरूरत की चीजें गांवों में ही पैदा कर लेते है।

भारतीय ग्रामीण जीवन का एक दूसरा पक्ष भी है जो सुखद नहीं है। ग्रामीण लोग बहुत अधिक गरीब होते हैं। कई बार तो उनके पास दो वक्त खाने-पीने को भी नहीं होता। न रहने को उचित मकान होता है और न पहनने को वस्त्र। अति वर्षा, सूखे आदि विपत्तियों के समय तो उनकी बहुत दुर्दशा हो जाती है। उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता और वे कई रोगों के शिकार हो जाते हैं। स्वास्थ्य के साथ-साथ लिखने-पढ़ने की भी कोई उचित व्यवस्था गांवों में नहीं होती। ज्यादातर ग्रामवासी अनपढ़ होते हैं। उनके बच्चे भी स्कूल नहीं जाते। कहीं स्कूल होता है तो वह गांव से बहुत दूर। बच्चे खुले में या पेड़ के नीचे जमीन पर बैठते हैं। पूरे स्कूल के लिए एक अध्यापक होता है और वह भी नियमित पढ़ाने नहीं आता।

शिक्षा के अभाव में ग्रामीण लोग अपना सीधा सादा हिसाब भी नहीं रख पाते और सेठ-साहूकार या बनिये पर निर्भर करते हैं। ये लोग ग्रामीण लोगों का भरपूर शोषण करते रहते हैं तथा उनसे मनमाना ब्याज वसूलते रहते हैं। परिणाम यह होता है कि एक ग्रामीण कर्ज में पैदा होता है और कर्ज में ही मर जाता है। कई गांवों और कस्बों में बंधुआ मजदूरी की प्रथा अभी भी देखी जा सकती है। इस अभिशाप से मुक्ति के लिए गांवों को अभी बहुत संघर्ष करना पड़ेगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि ग्रामीण जीवन में आमूल-चूल सुधार किया जाये।

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