Left wing & Right wing Politics in Hindi वर्तमान वामपंथी बनाम दक्षिणपंथी राजनीति

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Left wing & Right wing Politics in Hindi

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जब से केन्द्र में कांग्रेस की नेतृत्व वाली साझा सरकार ने सत्ता संभाली है, तभी से वर्तमान व्यवस्था में वाम पंथी दलों की भूमिका को लेकर तरह-तरह के सवाल उठते रहे हैं। ‘भगवा भूत’ को भगाने के लिए सभी ‘प्रगतिशील तथा धर्मनिरपेक्ष’ ताकतों के एकजुट होने को प्राथमिकता देना बुद्धिजीवी वर्ग को तर्कसंगत लगता रहा है। इस जल्दबाजी में किसी ने यह सोचने की जहमत नहीं उठाई है कि वामपंथी अपने समर्थन की क्या कीमत मांगते और वसूलते रहे हैं। विडंबना यह है कि साम्यवादी दलों के तेवर कुछ ऐसे रहे हैं कि वे बिना किसी जिम्मेवारी और जवाबदेही के ताकत का उपभोग-उपयोग भर करना चाहते हैं – हालफिलहाल शक्ति समीकरण अपने अनुकूल होने तक पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम ने उनकी हस्ती और पस्ती को एक साथ जगजाहिर कर दिया है। ऐसे में वामगंथी ताकतों की भविष्य में भारत की राजनीति में भूमिका पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

सबसे पहले सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह भविष्य निधि यानी प्रोविडेंड फंड में जमाराशि पर दिये जाने वाले ब्याज की दर को वामपंथियों की मांग-मर्जी के अनुसार तय नहीं कर सकती और इसमें कटौती करनी ही पडेगी। देर तक हवा में लाठियां भांजने के बाद वामपंथियों विवश होकर चुप हो जाना पड़ा। पूंजी निवेश के साधन, उदारीकरण और आर्थिक सुधारों के दौर में उन मध्यमवर्गीय खाते-पीते लोगों के लिए सुलभ होते रहे हैं और समझदार लोग अपना पैसा तमाम जोखिम उठाते हुए भी शेयरों में या अचल संपत्ति में लगाते रहते हैं। यह बात दोहराने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि वाहन हो या रिहाइशी घर, इनका सपना वही लोग पाल सकते हैं, जिनकी नौकरियां या रोजगार निरापद हैं। सरकारी नौकरों या सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में काम कर रहे लोगों को ही महंगाई भत्ते, प्रोविडेंड फंड की ब्याज और दरों या पेंशन की सुविधा की चिंता लगी रहती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो लोगो और का उन पर निर्भर रिश्तेदारों को भी शमिल करें तो यह भारत की कुल आबादी का एक छोटा सा हिस्सा है। इनकी हालत आज भी अपने अन्य वंचित देशवासियों से कहीं बेहतर है। सरकारी अस्पतालों की नि:शुल्क सेवाएँ इन्हीं के लिए हैं और अपेक्षाकृत बेहतर सरकारी स्कूलों में केंद्रीय विद्यालय के बच्चों की भर्ती के विशेषाधिकार भी इन्हीं लोगो के पास हैं। सरकारी नौकरों को देर-सवेर रहने के लिए सरकारी आवास भी मुहैया हो जाते हैं, जिनमें अधिकांश का दुरूपयोग सर्वविदित है। कुल मिलाकर जब वामपंथी मुखर होते हैं, तो इन्हीं संगठित कामगारों के हितों-स्वार्थों की रक्षा के लिए।

भारतीय विमान प्राधिकरण के कर्मचारियों के हाल के आंदोलन को किसी भी तरह श्रमिकों के उस संघर्ष के रूप में देखना कठिन है, जिसका संबध करोड़ों उत्पीड़ितों – शोषितों के हितों से है। अपने विशेषाधिकारों को हर संभव तरीके से बचाए रखने की उतावली को छुपाना इस बार बेहद कठिन रहा है। हवाई अड्डों की जो दुर्दशा है, उसके लिए इस प्राधिकरण की अकर्मण्यता और काहिली काफी हद तक जिम्मेदार हैं। अगर यही तबका कार्य कुशल और जिम्मेदार होता, तो हवाई अड्डों के सुधार के लिए निजीकरण और विनिवेश की जरूरत ही नहीं पड़ती।

आने वाले दिनों में किसी के लिए भी यह समझ पाना कठिन होगा कि वामपंथियों का समर्थन या अभिनंदन किसी भी लड़ाई में रत्ती भर मदद कर सकता है। इनके शासित राज्य पश्चिम बंगाल में श्रमिकों के अधिकारों की नमाइश हाल के दिनों में करने का दस्साहस कोई भी श्रमिक संगठन नहीं कर सका है। जाहिर है कि राज्य के विकास के लिए जरूरी विदेशी पूंजी निवेश, बहुराष्ट्रीय निगमों की सक्रियता और पूंजीपति उद्यमियों की पहल का महत्व उनकी समझ में आता है। और क्यों न आए? जब साम्यवादी चीन और रूस विश्व व्यापार संगठन वाली र्व्यवस्था की उपयोगिता समझते हुए आधुनिकीकरण का वरण कर चुके हैं, तब सिर्फ भारतीय वामपंथियों को ही नई अर्थव्यवस्था से परहेज क्यों हो? केन्द्र में किसी भी पार्टी को समर्थन देने के पश्चात वामपंथी कहना शुरू कर देते हैं कि उनका अंकुश इस सरकार को जनहित के पथ से विचलित नही होने देगा। वे यह भी कहते हैं कि जरूरत पड़ने पर वे सरकार का विरोध भी करेंगे। इन तमाम आश्वासनों से अब तक आम आदमी संतुष्ट होता रहा था, लेकिन अब इन तमाम आश्वासनों की निरर्थकता किसी से छिपी नहीं रही है।

विदेशी नीति के क्षेत्र में भी वामपंथी दलों की उपेक्षा और अवहेलना सोचनीय होती जा रही है। इरान के मामले में मार्क्सवाद ने अपनी बची-खुची इज्जत को भी दांव पर लगा दिया था, जिसका नतीजा भी सामने आ गया। सवाल सिर्फ इरान के मसले पर भारत के मतदान का नहीं है। यहाँ भारतीय विदेश नीति की स्वायत्तता का प्रश्न सबसे अहम है।

वामपंथी दलों को यह बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए कि सिर्फ अध भक्तों की तरह आचरण करने वाली अपने पार्टी को विचारधारा की घुट्टी पिलाते रहने से कुछ हासिल होने वाला नहीं। जनहित और राष्ट्रहित का प्रहरी बनने का उनका दावा यदि सच्चा है, तो फिर सरकार का साथ देते रहकर उसकी गलत नीतियों का विरोध संभव नहीं। बाएं देखते हुए दाएं चलते रहना हमें रास्ते से भटकाकर खाई-खंदक में ही पहुँचा सकता है।

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